Saturday, 5 September 2015

कठिन समय

जिसने  मरना  सिख  लिया है  जीने का अधिकार  उसी को ।
जिसने  काँटे पार किये हैं फूलों का उपहार  उसी को  ।
जिसने विकास के गीत संजोये  तलवारों  के झन झन स्वर पर
जिसने  सातों राग अलापे  रुन  झुन  गोली  के  बरसन पर ।
जो है बलिदानों का प्रेमी  जगती का उपहार उसी को 
जिसने  कांटे पार कर लिए फूलों का उपहार उसी को ।
                जो  हँस हँस कर और  मस्ती लेकर  जिसने सीखा है  बलि होना
               अपने कष्टों पर मुस्काना औरों के  दुखड़ों पर रोना 
          जिसने  सहना  सीख  लिया  है  संकट  हैं  त्यौहार उसी के  
            फूलों  का उपहार उसी को ।
ओ  दुर्गम   बीहड़  पथ का पंथी ,जोन कहीं भी रुक कहीं पर
अपने तन पर  घात सहे पर जो न कहीं भी रुका कहीं पर ।
झुका रहा है  मस्तक अपना ये सारा संसार उसी को ।
  जो  काँटों पर चलना सीखा  फूलों  का उपहार  उसी को ।
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साहसी को बल मिला हैं  म्रत्यु ने मारा नहीं है
राह ही  हारी  सदा है राही कभी हारा नहीं है
जो  व्यथायें प्रेरणा दें उन  व्यथाओं को  दुलारों
जूझकर  कठिनाइयों से  रंग  जीवन  का  निखारो ।
बृक्ष कट कट कर   बढ़ा है दीप बुझ बुझ कर  जला है ।
मृत्यु से  जीवन  मिले तो  आरती  उसकी उतारो ।

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