Saturday, 25 April 2015

वैवाहिक विवरण matrimonial

। चन्द्र भानु ने अखबार खोला ।matrimonial  के पेज पर  पढ़ा  वधू की  आवश्यकता । सारे विवरण पढ़े एक पसन्द आया  । लड़का पढ़ा लिखा था सरकारी नौकरी करता था । अपनी ही जाति बिरादरी का था  । बस फिर क्या था  आनन फानन में लड़का देख  आये  और रिश्ता तय हो गया ।
      वह एक गरीब परिवार था । किराये के खपरैल जैसे मकान में  रहता था  ।लड़का कहीं बाहर नौकरी करता था ।भानु ने  अपनी बेटी केलिए  उपयुक्त समझा                ज्यादातर लड़की वाले लड़की को अपना  बोझ समझते हैं  । उन्हें इस बात को  पता करने किकोई जरुरत महसूस ही नहीं होती की लड़के के कैसे संस्कार हैं । घर परिवार की  औरतों का रहन सहन कैसा है । उनके विचार कैसे हैं  ?  बीएस किसी तरह से लड़की के हाथ पीले हो जाएँ ।
          शादी  की तिथि  निश्चित होगई  । अप्रेल  गर्मी का महिना था  । जहाँ शादी पक्की हुई थी वह एक गाँव था । वहाँ न पानी था न बिजली थी । घर की औरतें  कुए से पानी  लाती थी 
      खैर  इस दिन दो  मूर्खों का  विवाह हुआ था । मूर्ख  इसलिए थे कि न तो लड़के  ने लड़की  देखी न लड़की से कुछ सलाह मशविरा किया गया । ऊँट  जैसा वर  बकरी जैसी वधू । दोनो ही अपने अपने ढंग से सपने बुन रहे थे । वर था  महत्वाकांक्षी   कुछ कुछ   लालची भी था  ।  घर   बैठे  दहेज़ की  इनकम से  अमीर  बनने की  इच्छा रखता था ।
       वधु  माँ की  बेरुखी से तंग थी  । अत:उसके हृदय   में  प्रेम का पौधा बड़ा होना चाहता था । उसे स्थाई  संरक्षण की जरुरत थी  ।  पर क्या दौनों की अभीप्सा पूर्ण हुई ? नहीं  । इस पर चर्चा  आगे  करेंगे ।
       आज  शादी का दिन  है । वधु पक्ष के  यहाँ बड़ी धूमधाम है  पूरा  मोहल्ला रंग   बिरंगी बिजली की  लड़ियों और बन्दनबार से सजाया गया है । बरात  जो  आ रही थी ।  गाँव की बरात थी । वर ने  कोरे लट्ठे का बिना धुला पजामा पहन रखा था ।सिर पर मोहर बांधा हुआ था  मुँह में लाल रँग का फीता दबा  घोड़े पर चढ़कर  स्वागत स्थल पर आया था । पीछे  पीछे उसके गँवार रिश्तेदार  अपनी महानता पर  इतराते हुए आये थे ।  गरीबी  उनके  वस्त्रों से साफ़ झलक रही थी दूल्हे के फनी वेष को देखकर घराती बच्चे मुस्कुरा रहे थे तथा एक दुसरे को कुहनी मर रहे थे  । वर के पिता ने कभी इतनी मिठाइयाँ   और भव्य भोजन न खाया था सो इतना खाया कि बारबार  शौच  को  जाना पड़ रहा था ।
वर को देखकर लोग  कह रहे थे कि पढ़ा लिखा  गँवार  मालुम पड़ता है ।
ऐसे लोगों का भी भव्य स्वागत होरहा था ।फेरे पड़े विदा हुई  ।  पर क्या वर वधू की अभीप्सा पूरी हुई ? नहीं । सूना है वर पक्ष का  लालच पूरा नहीं हुआ । लड़की को उनके  हिसाब से नहीं दिया गया । इसलिए वधु को पूरी  जिन्दगी उनके कोप का भाजन बनना पड़ा ।घर की औरतों ने भी अपना पूरा फर्ज निभाया । जो कपडे गहने पिता के घर से उसे मिले थे वे कपडे अधिकांश चुरा लिए गए और  गहने बेचकर खा गए । इसके चलते दोनो ही अपने अपने नसीब को ढोते रहे ।
      संसार  का हीकुछ ऐसा नियम है यहाँ कोई सुखी नहीं । नानक दुखिया सब संसारा। यहाँ प्रतिकूल विपरीत व्यवहार देखने को मिलता है । कोई किसी का नहीं लाख कोई  ईमानदारी से काम करे पर "मुंडा  मुन्डा विभिन्न मत " किसी को यकीन ही नहीं आता । यहाँ सभी  झूठे हैं । अपना अपना स्वार्थ  सिद्ध  कर रहे हैं दुष्ट लोग मान ही नहीं सकते कि कोइप्रेम भी कर सकता है उन्हें  उसमें भी दाल में काला  दिखता है ।
दूसरों का धन   पर नियत गिराने वाले कभी कोई  काम नहीं करना  चाहेंगे  ।
चुगली बुराई करने  वाले कभी अपना निरिक्षण नहीं करते  । लाख बुराई होने के बावजूद वे अपने को दूध का धुला समझते हैं ।  कैसे बचें इस  शादी के  बन्धन से ?  पाठको  सलाह दो ।

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