Sunday, 8 March 2015

अहंकार मत कर । Do not be proudy

माटी के पुतले तुझे कितना गुमान है । तेरी औकात क्या तेरी क्या  शान है ?
चार दिन की है ये जिंदगानी तेरी । रहने वाली नहीं नौजवानी तेरी ,
खाक हो जायेगी  हर निशानी तेरी । भस्म हो जायेगी सब कहानी तेरी  ।
चार दिन का ही तेरा मान सम्मान है । माटी के पुतले तेरा ----------। 
         राज  हस्ती का अब तक न समझा कोई ।है पराया यहाँ पर न अपना कोई
   मौत से अब   तलक  बच न पाया कोई , ऐसी तक़दीर वाला न देखा कोई ,
कुछ समझता नहीं कैसा इंसान है । माटी के पुतले ------------।
ये जो दुनियां नजर आरही हैअजीज ,  जान जाएगा इनको न तेरे कहीं ।
तुझको ये बात मालूम हैकि नहीं , खोज ले तुझसे लेने को इक दिन रही ।
अपने ही घर में तू एक मेहमान है । माटी के पुतले ---------।
इस अँधेरे में एक दिन तु खो जाएगा ,  अपनी हस्ती को गम में डुबो जायगा
ये खजाना तेरा यहीं रह जाएगा , मौत के वक्त कुछ भी न काम आयेगा ।
तू मगर सारी बातों से   अनजान है  । माटी के पुतले  --------------- ।
होके मझधार में एक किनारा बने , इस जमीं पर वफ़ा का सितारा बने
सबका अच्छा बने  सबका प्यारा बने , आदमी  आदमी का सहारा बने  ।
बस यही आदमीयत की पहिचान है । माटी के पुतले ------------ ।
चार दिन की कहानी है ये जिन्दगी , मौत की नौकरानी है ये जिन्दगी   ।
मय्यतों की    निशानी है ये जिन्दगी , एक  नादान  फानी  है ये जिन्दगी  ।
ऐसी जिन्दगी  से कितना परेशान हैं ।  माटी के पुतले --------------।
कोई चंगेज न कोई हिटलर रहा । कोई  मुफलिस न कोई तवंगर रहा ।
कोई बदतर रहा न कोई  बेहतर रहा , कोई दारा न कोई सिकंदर रहा
इतनी ही बस तेरी आन है शान है ।  माटी के पुतले ----------------।
इन ग़रीबों को क्यों कुचलता चलता है तू ,इस तरह से उछलकर  जो  चलता है तू ।
अपनी ताकत पर इतना अकड़ता है तू ,  माल दौलत पर इतना  अकड़ता है तू  ।
बुलबुले से भी नाजुक तेरी जान है  । माटी के पुतले ------------। ।
ये  कुटुम्ब  कबीले न काम आयेंगे ,जो भी हैं अपने तेरे न काम आयेंगे ।
ये महल दुमहले न काम आयेंगे , कब्र की गोद में सारे सो जायेंगे
मोह मायामें तेरी फंसी जान है । माटी के पुतले -------------।
यार मेरे बहक करके चलता है तू ,तू तबस्सुर में बनके जो चलता है तू
अपनी अस्मत पर इतना अकड़ता है तू  , कोई कुछ भी नहीं ऐसा समझता है तू ।
मौत की भूल बैठा कितना  नादान है ।  माटी के पुतले ----------- ।
सारी कायनात है बस जिन्दगी के लिए , अपनी सारी अदाएं  छोड़ कर जो जिए
चाहे दुनियां तुझे फिर बुरा ही कहे , एक पल की खबर भी नहीं है तुझे ।
सौ बरस का मगर घर में सामान है  । माटी के पुतले तुझे कितना गुमान है ।

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