Wednesday, 1 October 2014

खाली नाव । Empty boat

  झेन फकीर  लिंची  एक बार नदी में  नाव  पर  यात्रा कर रहा था ।  अचानक
एक  दूसरी नाव उसकी नाव  से  आकर टकरा गई ।  लिंची ने    आँखे खोली औए क्रोध में भरकर उस  नाव वाले  व्यक्ति से  कुछ कहने ही जा रहा था कि उसने देखा कि नाव  खाली थी  और उस पर कोई सवारी नहीं  थी । 
    अब  लिंची को कुछ भी कहने का उपाय नहीं रहा । किस बात पर   और  किससे  अपना क्रोध  प्रकट करता । नाव तो खाली थी   और वह  धार के  साथ
बहकर  आगई थी । तभी वह लिंची की नावसे टकरा गई थी । खाली नाव पर  क्रोध उतारने की कोई सम्भावना न थी । अब एक ही उपाय रह गया   उसने अपनी  आँखें  बन्द कर लीं  और क्रोध को पकड़कर उल्टी  दिशा में ले गया । यानी उसने अपना क्रोध देखा और केंद्र पर पहुँच गया शून्य में । खाली नाव आत्म  ज्ञान  का  साधन बन गई । उस मौन रात्रि में लिंची शून्य में सरक गया    और क्रोध उसकी सवारी बन गया । खाली नाव उसकी गुरु बन गई । अब लिंची का कोई  अपमान करता तो वह हँसता । और कहता नाव खाली है
ज्ञान  से  चलने  वाले को  शून्य  होना पड़ता है । और प्रेम से चलने वाले को  पूर्ण  होना पड़ता है । लेकिन   शून्यता और  पूर्णता दौनों  ही एक घटना के दो नाम हैं
शून्य से   ज्यादा पूर्ण और कोई चीज नहीं ।
  गौतम बुद्ध भी  कहते हैं की  हे मनुष्यों   !  अपने  मस्तिष्क की नाव  खाली करदो   शीघ्र पार लग जायेगी ।   जैसे  पत्थर से भरी  नाव  पानी  में  तैर नहीं सकती  उसी प्रकार  व्यर्थ के विचारों से  भरा हुआ  मस्तिष्क भव  सागर  पार  नहीं कर सकता ।

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