Thursday, 25 September 2014

jivan kaa darshanजीवन का दर्शन

जीना जो चाहे शान से  मन में तू अपने ठान ले ।
जब तक हैं तन में प्राण तू कुछ  काम कर कुछ काम कर।
जीवात्मा स्वभाव से सुख  चाहता है ।दुखों से  दूर रहूँ ऐसा  प्रयास करता है ।अविद्या के  कारण संसार में रहने की इच्छा होती है ।  जिस दिन अविद्या  को  हटा देगा  उसी दिन से उसको  संसार से  वैराग्य  हो जाएगा ।और इसमें रहने की इच्छा नहीं रहेगी । संसार में रहने की इच्छा हमारे अज्ञानता की द्योतक है  .।
   "  भोगों में सब कुछ मानता  जीवन  नहीं  ये मरण है
मन मानियाँ सब छोड़ दे ,कर्तव्य सब पहिचान कर ।
जब तक संसार में सुख  दिखता रहेगाताभी तक संसार अच्छा लगेगा । और जब संसार का सुख  दूख से मिश्रित लगने लगेगा तब इस सुख से बड़ा सुख परमात्मा काअनुभव होने लगेगा । तब संसार में रहना अच्छा नहीं लगेगा ।
संसार से  छूटने के लिये  विवेक  जगाकर  इसमें  दुःख की अनुभूति करने से हम संसार से   छूट नेके बाद  महानन्द को  प्राप्त  हो  जायेंगे ।
    "  पायेगा अपना  लक्ष्य तू मन को तनिक  कुछ  थाम कर । " 
     रचकर नया  इतिहास  कुछ तू पूर्वजों का नाम कर । "
जीवात्मा स्वयं  आनन्द स्वरूप है  उसको किसी भोग की आवश्यकता नहीं है ।यह संसार जीवात्मा का  भोग्य है ।  प्राणी सुख  भी लेवे  और राग भी  उत्पन्न न हो यह  स्थिति  वीतराग की  अवस्था में हीप्राप्त हो सकती है ।

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