Monday, 15 September 2014

मृत्यु हमारी मित्र है । Death is our friend

वधर्म   ग्रन्थ  भी  मानते हैं कि  मृत्यु  जीवधारी के लिए अनिवार्य है क्योकि
साहसी को बल मिला है  ,मृत्यु ने मारा नहीं है । राह ही  हारी  सदा है, रही कभी  हारा नहीं है ।       जो  व्यथाएं प्रेरणा दें उन व्यथाओं को  दुलारों  ।
जूझ कर कठिनाइयों से  रंग  जीवन का  निखारो ।        वृक्ष कट कट कर   बढ़ा है  ,  दीप  बुझ बुझ कर जला है  ।       मृत्यु से  जीवन  मिले तो  आरती  उसकी उतारो ।   साधक  !  उत्साह से हो  जा  खड़ा  ,  हे  मित्र  !  हिम्मत  बाँधके ।
वे भी  मनुज  तुझसे ही थे जो  मुक्त पहले  हो  चुके  । 
संसार का  नियम  प्रकृति के  अनुसार  गतिशील होता है   कुदरत का  नियम है
"जातस्य      हि ध्रुवो  मृत्यु  ,  ध्रुवो  जन्म  मृतस्य च  ।    अर्थात्   जो  जन्मा है  उसकी  मृत्यु  अवश्य होगी  ।  और  जिसकी  मृत्यु  हुई है   उसका    पुनर्जन्म भी  होगा ।   जन्म   लेने की  घटना  बहुत ही  दुखदायी है । देखिये
औंधे लटकना  गर्भ में ,रोते हुए फिर  जन्मना  ।
सर  पीटते  जीना  यहाँ  फिर अंत में मर जावना ।
  तो मित्रो  ! मैं तुम्हारी  दुश्मन नहीं हूँ  ।मैं तुम्हारी  महा मित्र हूँ । मैं  तुम्हें विश्राम देती हूँ  जिन्दगी भर के  उपद्रवों  तथा  आपा धापी के  बाद । मौत के बाद तुम्हें नया  शारीर मिलता है   ताकि  तुम  अपने  पुरानी  आदतों  तथा पुराने  ढंग ढांचों  को  तोड़ सको और  नए  सिरे  से  सुख पूर्ण  जिन्दगी  बिता सको ।  संसार में  आकर  कोई  जाना नहीं  चाहता  । सभी  की यह  अभीप्सा  होती है की वह  कभी न मरे । 
     सिकन्दर  भारत  की  यात्रा पर  आया  यहाँ  आकर  उसने  सूना  कि    किसी  मरुस्थल में  कोई  झरना है  जिसका  पानी  पीने  से  व्यक्ति  अमर  हो  जाता है ।   यह तो  स्वाभाविक  है  कि  दूनियाँ  लूटने  के बाद   कोई  भी  अमर  होना  चाहेगा  ताकि  उस  खजाने  को  enjoy  कर  सके ।  तो  सिकंदर ने  अपने  सिपाहियों को  लगा दिया  उस झरने  का पता लगाने  को । आखिर में  उसे झरने  का  पता  चल  गया । उसने  झरने  के चारों  ओर  पहरा  लगा दिया  जिससे  कोई  और  न आजाये  और  वह निर्विघ्न  पानी  पी सके  ।   वह  अकेला ही  झरने के पास  गया । एक  छोटी सी गुफा में  वह  झरना था । उसका  जल  स्फटिक  मणि  जैसा  चमक  रहा था । जल  देखते ही  उसकी  प्यास  बढ़ गयी  जैसे  ही  उसने  पानी की  अंजली  भरनी   चाही , उस   नी रव वातावरण में एक  आवाज  गूँजी  ," ठ हरो " सिकन्दर ने  चारों तरफ देखा  सामने एक कौआ  बोल रहा था ।उसने  सिकन्दर को कहा कि तुम्हारी तरह मैं भी अमर  होना चाहता था ।   मैंने भी  इसका  पानी जी भर के  पी लिया था । और अब तुम मेरी दशा देख रहे हो  ।  पानी पीने के  बाद  सदियों  बीत गई पर मुझे मौत नहीं आई ।मेरे पँख  टूट कर गिर रहे हैं मैं बहुत  अशक्त होगया हूँ । मैं  अब मरना  चाहता हूँ पर  मर  नहीं  पाता  । मैं अपनी अशक्तता से  बहुत दुखी हूँ ,सिर पटकता हूँ  चोट नहीं लगती पहाड़ से गिरता हूँ पर  जिन्दा का  ज़िंदा रहता हूँ ।आग में  चला जाऊं तो  पंख नहीं जलते  ।जहर पीता  हूँ तो असर नहीं होता ।मुझे मरना है  मैं बहुत थक गया हूँ  । बताओ मैं कब तक जीता   रहूँ  ?
          अब यह  जिन्दगी बहुत  बोझ  लगने लगी है ।अगर तुम्हें  कोई  ऐसी  जगह पता हो जो  अमरत को  काटने वाली हो तो मुझे बतादो । मेरी  आपबीती  सुनने के बाद भी यदि  आपकी  इच्छा  जल  पीने की हो  तो  शौक से  पियो ।पर  मर न सकोगे । 
सुनकर  सिकन्दर ने कुछ पल  सोचा   फिर  ऐसा  भागा की  मुड़ कर नहीं देखा ।
  साधको ---  ज़रा  सोचो  विचार करो कि  हमारी  विराट  आत्मा  एक  छोटे  से  संकीर्ण  स्थान में बन्द है  यह  आत्मा का  काराग्रह  है  ।क्या तुम  चाहोगे  कि तुम्हारी  यह  शाश्वत  आत्मा  हमेशा के लिए  कारा गार में रहे ।और इन  सीखचों  के बाहर न निकल सके ।
  मित्रो  !  मौत  उनको  दुःख  देती है जो  दुनियाँ में  अन्धे  बन कर  जीते हैं  अज्ञानी  लोग  मृत्यु से डरते हैं  ।  अन्य्था  मृत्यु  हमें नया  शरीर  देती है ताकि
हम  जीवन का  असली  आनन्द  ले सकें  । जो व्यक्ति जीवन में समग्रता से जिया  ध्यान पूर्वक जिया  अपने को  रूपान्तरित किया उसके लिए परमात्मा में  निमग्न  होने का  अवसर मिल गया ।वह तो  विराट  आकाश में  लीन हो  जाएगा ।
यही आनन्द  है यही  सत्य है।

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