Tuesday, 30 September 2014

ओम् की महिमा ॐ ॐ ॐ

पितु मातु  सहायक  स्वामी  सखा  तुम  ही  इक नाथ  हमारे हो।
यह हम किसकी  स्तुति  प्रार्थना कर रहे हैं  ?    उस ईश्वर की । जिसने यह ब्रह्मांड बनाया ।उसका नाम  लोक प्रसिद्ध है   वह   नाम है  ओउम् ।स्वयम्  ईश्वर का यह कथन है कि मेरा निज नाम ओउम् है । यह नाम मुझे पुत्र वत् प्रिय है । यह नाम मेरे  सुलक्षणों से  युक्त  पुत्र तुल्य प्राणों से प्यारा है ।
   जो लोग  मेरी शरण सत्याचरण और प्रेम से लेते हैं उसका मैं अन्तर्यामी  रूप से अज्ञान का विनाश कर देता हूँ  । तथा उनकी  आत्मा में शुभ गुणों का प्रकाश कर देता हूँ ।उनको सब दुखों  से अलग कर देता हूँ । 
   ओउम्  सर्व  व्यापक  सता है ।  वही  आकाश वन पहाड़ों की   ऊँची ऊँची  चोटियों में  विद्यमान है । वही नदियों की तरल तरंगों में है ।सागर की  गहराइयों से लेकर  सूर्य तक वही  स्थित है । वह सब में प्रतिष्ठित है । चाहे  चेतन  प्राणी हो अथवा जड पदार्थ  जैसे पेड़ पौधे फूल पत्तियाँ  ईट  पत्थर आदि , वह सब में समाया हुआ है ।चीटी से लेकर  हाथी तक  ,परमाणु से लेकर सौर मंडल तक में
ओउम् का  प्रवेश है । "ईश्वर सर्व  भूतानाम्  हृद्देश  अर्जुन   तिष्ठति ।"  गीता  ।
ओउम् अक्षर व्यापक  अर्थ वाला है ।
     ओउम् अक्षर  तीन  अक्षरों का  समुदाय है  ----अ  +उ   + म्   ।
अ  - परमात्मा उ   -  आत्मा  म--  माया अथवा  प्रकति  ।  यानि  संसार के समस्त जड पदार्थ । परमात्मा ने  हम  जीवों के भोग्य के लिए  संसार की  रचना  माया से की । जैसे एक कुम्हार मिटटी से  घडा  हम लोगों के प्रयोग के लिए बनाता है  । कठ उपनिषद  कहता  है कि ओउम् अक्षर ही ब्रह्म है ,ओउम अक्षर को  जानकर कोई  साध्क्जिस चीज की इच्छा करता है वह उसको प्राप्त हो जाती है ओंकार  सब प्राणियों का सबसे श्रेष्ठ आलम्बन है सहारा है । साधक इस  आलम्बन को कभी न छोड़े ।  यही वह सीढी है जिसके सहारे हम ब्रह्म लोक या कहो कैवल्यधाम  में पहुँचते हैं ।
निश्चय ही कोई विद्वान् ओउम् के सहारे  ब्रह्म को  प्राप्त करता है । यह  अ मृत रूप अक्षर  ही हमारे आगे  पीछे  दायें  वायेँ  फैला हुआ है ।  वह परमात्मा  निराकार है । वह  वायु में है । क्या  वायु  दिखाई पडती है ।    तो   परमात्मा न  दिखाई पड़ता है ।  न पकड़ने में आता है । वह अलख निरंजन है । उसका कोई  रूप रंग नहीं है । कोई  चिन्ह नहीं है । न वह चिन्तन में आता है । वह केवल अनुभव गम्य है ।
     हम दिन रात  व्यवहार में  परमात्मा को ही अनुभव करते हैं ।हम जो बोलते हैं उसके  पीछे वही इश्वर है  । ओउम् नाम की ध्वनि  से  शरीर के रोग दूर होते हैं मरणासन्न व्यक्ति के  कानों में यह ध्वनि  सुनाई जाये तो  उसकी मुक्ती होती है   । हमारा सारा जगत व्यवहार   विना  ओउम् के नहीं  होता । मुख से बोलने की शक्ति कानों में सुनने की शक्ति हमारे  दिन रात चलने वाली  श्वांस किसकी  बदौलत है वह परमात्मा ही है  । हमारी आत्मा अल्पज्ञ है  परमात्मा सर्वज्ञ है । आत्मा   अल्पशक्ति  रखती है । तो ये  शक्ति कहाँ से लेती है  ?   परमात्मा रूपी power house  से आत्मा को बल मिलता है ।
आओ उस  परम शक्ति को  नमस्कार करे  जो  अद्भुत कर्मा  और अरूप है  फिर भी  वह  अनेकों  रूपों में  दिखाई पड़ता है । परमात्मा जो सबका  साक्षी  उस  आत्म  दीप को नमस्कार  ।  जिस तक जाने में  पथ  में ही  मन  और बुद्धि हार  जाते है ।

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