Monday, 29 September 2014

ययाति की जीवेषणा (कथा )

     उपनिषदों में  ययाति की कथा है ।
ययाति एक राजा था । उसकी सौ  रानियाँ  थीं ।उसके सौ   बेटे थे  वह  सौ वर्ष का     बूढ़ा था   बड़े  बेटों की उम्र  किसी की  अस्सी वर्ष  किसी की सत्तर वर्ष की होगई थी । उसकी मौत  आ गई , लेकिन वह मरना नहीं  चाहता था ।भोगों से उसकी  तृपति  नहीं  हुई थी । वैसे भी  इस  संसार में  कौन  व्यक्ति  तृप्त हुआ है । वह  मौत के  सामने  गिडगिडाने लगा कि आप  तो बहुत  जल्दी आगई ।  खबर तो करनी थी । मेरी तो  सारी  इच्छाएं अधूरी रह  गईं ।  थोड़ा समय और देदो । मुझे  भूखा और  अतृप्त तो  ना  मारो ।
   मौत   ने कहा कि जाना तो पडेगा । एक काम करो अपने  बदले  किसी और को  भेज दो ।  ययाति ने  अपने  लड़कों से  जीवन माँगा ।  सारे बड़े बेटे तो कन्नी काट गए  । सबसे  छोटा बेटा  तैयार होगया । वह  अभी  बीस  वर्ष का  ही था  अभी  अभी  जवानी  चढी थी । जिसने  जिन्दगी का अभी  कुछ भी न देखा था । उसने कहा पिताजी मैं  अपनी जवानी दे सकता हूँ  । जब आपका मन सौ साल में भी नहीं भरा तो मेरा कहाँ भर पायेगा ।  मुझे आशीर्वाद दो पिताजी कि मैं  आपके कूछ  काम आसका । पिता तो बहुत खुश हुआ कि तू ही मेरा असली  बेटा है ।
         सारा तमाशा देख कर  मौत को  उस  जवान बेटे पर  दया आगई  ।  उसने  उसे  समझाया कि पिता  अपने  आपको  बचाने के  लिए  तेरी बलि  चढ़ा रहा है । तूने  तो जिन्दगी का अभी  कुछ भी  नहीं देखा  ।  मैं इन्तजार कर सकती हूँ तू सोच ले । अनुभव से देख  ले  । तेरे बड़े  भाइयोन्ने जो तुझसे ज्यादा  अनुभवी हैं
  मना कर दिया ।
उस बेटे ने बड़ी  बहुमूल्य बात कही , कि जब मेरे पिता सौ साल के हैं और उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई तो मैं  अस्सी साल घिसट कर क्या करूँगा । मेरे  भाई  मना कर रहे हैं  यह  फिजूल की  बातें हैं । ये उस मटके के सामान हैं  जिसमे  अनेकों  छेद हैं  वह कभी नहीं भर सकता ।  वासना दुष्पूर है  ।   बिना तली  की  बाल्टी  कुए में  डालो  पानी न भर सकेगी । बस मैंने जान लिया   तू मुझे लेजा ।
              बाप को  फिर भी  होश न  आया ।इतनी अद्भुत बात सुनकर भी  भाइयों को कोई  फर्क नहीं  पड़ा  । लोग ऐसे ही जिन्दगी को पकड़ते हैं  बेटे की उम्र  बाप को लग गई ।बेटा  मर गया ।  अब  फिर  सौ साल बाद मौत  आई  उसी तरह फिर गिडगिडा या, । मौत  फिर  एक  बेटे की बलि  चढ़ा गई  ।
सौ साल बीत गए  पता ही न चला ।  तब तक उस  राजा ने  सौ शादियाँ  और कर लीं  सौ बेटे  और  पैदा होगये । यह  सिलसिला  दस  बार  चला  अब  ययाति  हजार वर्ष का  हो  गया और  काफी  बूढा भी  । अब वह  शरीर से भी  लाचार होगया था ।
इस बार  मौत  आई  पूछा ययाति से  कि अब  क्या  इरादा है   ययाति  हँसने लगा कहा कि मैं चलने को तैयार हूँ । यद्यपि  मेरी  इच्छाएं  पूर्ण  नहीं हुई हैं  अभी  उतना ही  अतृप्त हूँ  जितना पहले था बल्कि उससे भी अधिक । मगर एक बात  साफ  हैकि कोई भी इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती  ।  मुझे ले चलो यह  भिक्षा पात्र  कभी  भरेगा नहीं ।यह  बिना   तली का है  कुछ भी डालो   रिक्त ही रहेगा । 
साधको ---  जीवेष णा शरीर से बंधी है मन से बंधी है इच्छाओं से बंधी है ।  यही तो  संसार है  जीवेष णा से मुक्त हो जाइए  तो न संसार है न जीवन है  यही  शुद्ध जीवन है यही  जीवन कुन्दन  समान   विशुद्ध  जीवन है यही मोक्ष है निर्वाण है । ।                                     

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