Monday, 18 August 2014

कृष्ण की गोपियाँ और जन्माष्टमी

भारत देश में जन्माष्टमी का पर्व हर साल मनाया जाता है यह पर्व  हमें  एक बहुत ही  महत्वपूर्ण  सन्देश  देता है 
इस धरती पर सबसे ज्यादा लोक प्रिय आराध्य  श्री कृष्ण जी हैं  । लोक प्रिय होने का अर्थ है कि उस व्यक्ति के विचारों सेसब लोग अत्यधिक  प्रभावित हों  । साथ ही उन विचारों के अनुसार जीवन व्यतीत करना अपना धर्म समझते हों ।परन्तु वस्त्तु स्थिति इसके एकदम विपरीत है । लोग  मंदिरों में जाकर घंटी  बजाकर कुछ फूल चढ़ाकर  कृष्ण की पूजा करना ही  अपने कर्तव्य की इति श्री  समझते हैं । होगयी उनकी कृष्ण के प्रति भक्ति ।कृष्ण  अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी पूर्ण उत्साह से भरे हैं  । उदास नहीं हैं
            कृष्ण ने  समग्र  जीवन को पूरा ही  स्वीकार किया है  । वे बचपन में एक नटखट  बालक  हैं    माखन मिश्री  खाना उनका  शौक है  ग्वाले  गोपियों के वे सखा है  गायों के पालक  रक्षक हैं  योद्धा हैं  योगी हैं   राधा  की  भक्ति के समक्ष  समर्पित हैं ।अर्जुन के  गुरु तथा  सखा हैं उद्धव  के ज्ञान से  अभिभूत हैं । माता  यशोदा तथा  गोकुल  बासियों के  प्राण हैं  । इसके अतिरिक्त वे    दीन दुखियों के  सहायक हैं । गरीब सुदामा की  मैत्री  जग  जाहिर है
      इतने  लोक प्रसिद्ध   कृष्ण  के  जीवन से हम  भारत  वासियों ने क्या  सीखा   ?  आज  लोग कृष्ण के विचारों  का  आपनी मन:स्थिति के अनुसार  इस्तेमाल कर रहे हैं ।  यद्यपि हमारे  सभी धर्म ग्रंथों में कृष्ण कोसबसेवे ज्यादा  मान दिया है। परन्तु  लोग  पूजा तो  करते हैं पर आचरण नहीं  करते अमल नहीं करते ।
  कृष्ण के समय भी  पुरुष प्रधान समाज था । तब भी कृष्ण ने गोपियों कोसमाज की  मुख्य  धारा में  शामिल किया  , उन्हें पुरुषों के बराबर दर्जा दिया ।  कृष्ण की  कथा विना गोपियों के पुरी ही नहीं होती । यह महिला सशक्तिकरण का  एक तरिका था । गोपियाँ  कृष्ण किरास लीला में  शामिल  होती थी  और  उनके  परिजनों  को  कोई एतराज नहीं होता था उन्होंने कभी  बेड़ियाँ नहीं पहिनायी ।
यह विश्वास की  पराकाष्ठा थी ।
   लेकिन  दुःख इस  बात का है कि  पुरुषों ने इन कथाओं का अलग ही  मतलब निकाला । वेशक इसका  नुक्सान जितना  महिलाओं का हुआ  उससे कहीं  ज्यादा  पुरुषों  का हुआ । इस कटु सत्य को  कोई  स्वीकार नहीं करता ।वे अपने दुष्कर्मों को सही  साबित करने के लिए  कृष्ण की गोपियों और सोलह हजार रानियों की दुहाई देते नहीं थकते  ।  वे  राधा कृष्ण के संबंधों पर भी  छीटा कसी  करते हैं  ।
वे  प्रेम और  वासना में फर्क नहीं समझते । कृष्ण की लीला  हमें  सन्देश  देती है कि पुरुष भी महिलाओं का मित्र हो सकता है  वशर्ते  पुरुष  मानसिक  रूप से
मजबूत हों  ।  पुरुषों को समझना होगा कि दैहिक  जरूरतों तथा  वासनाओं के  आगे भी कोई जमीन है जहाँ नर नारी में  कोई  भेद नहीं है  । यहाँ कोई भी महिला मीरा   या  राधा  हो  सकती  है । 
यदि  लोग  अपनी  कमजोरियों को  स्वीकार करें और  मजबूती की  ओर कदम बढायें तो  समाज में परिवरितन हो सकता है ।लोगों का  चरित्र  खुदब खुद  मजबूत  हो जाएगा ।तभी   कोई  कृष्ण  तुम्हारे  दर  पर  खड़ा  दिखाई  देगा ।

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