Monday, 11 August 2014

हे ईश्वर मेरी विनती सुनो

इतनी  ऊंचाई न देना  प्रभुजी कि धरती  पराई  लगने लगे   ।
इतनी  खुशियाँ भी न देना कि  किसी के दुःख पर हँसी  आने लगे ।
नहीं  चाहिए  ऐसी  शक्ति जिसका  निर्बल पर प्रयोग करूं  ।
नहीं  चाहिए  ऐसा भाव कि किसी को  देख  जल जल  मरूँ   ।
ऐसा ज्ञान मुझे न देना जिसका अभिमान  होने  लगे  ।
ऐसी  चतुराई भी न  देना  जो  लोगों को  छलने  लगे । 
          महा  भारत  का प्रसंग है   ,ज़रा संध के वध  के बाद  युधिष्ठर ने  राजसुय यज्ञ करने का संकल्प किया ।इन्द्रप्रस्थ में  यज्ञ होना था । युधिष्ठर के चारों भाई  सभी  प्रदेशों को  जीत  चुके थे । भीष्म  पितामह द्रोणाचार्य   दुर्योधन  और उसके सारे भाई भी  आमन्त्रित थे । युधिष्ठर की  दीक्षा  के बाद अर्ध्य देने का समय आया । पितामह ने कहा कि  "आचार्य  ऋत्विज या  सम्बन्धी अथवा स्नातक या राज को अर्ध्य दिया जाता है । " युधिष्ठर ने  श्री कृष्ण को  अर्ध्य देने का  अधिकारी माना । कहा कि इस पृर्थ्वी पर  सज्जनों में ही नहीं विद्वानों में भी कृष्ण ही इस योग्य हैं । 
   शिशुपाल  भी  आमंत्रित था  उसने इसका   विरोध किया , कहा  इतने राजाओं के होते हुए  कृष्ण को अर्ध्य नहीं दिया जाना चाहिए  । कृष्ण राजा नहीं हैं  । दूसरी बात  आपने वासुदेव को भी  बुलाया है   तो पिता के होते हुए  पुत्र पूजा का  पात्र कैसे  ?  शिशुपाल  खरी खोटी युधिष्ठर को सुनाने लगा  ।  गलियां भी  दी  ।तथा और  राजाओं को भी  अपनी  तरफ से लड़ने को  उकसाने लगा ।

   भीम ने  जब यह देखा तो वह  क्रोध में भर गया  । भीष्म ने रोका और  शिशुपाल को बुरा भला कहा । अन्त में शिशुपाल ने कृष्ण को  सीधा ललकारा । कहा  रे कृष्ण तू    दास है राजा नहीं ।  हम तेरा  अर्ध्य लेना  पसन्द नहीं करेंगे ।
तुझमें शक्ति है तो लड़ , अन्यथा  तुझे पाण्डवों सहित  यम पूरी पहुँचा दूँगा  ।
               दुर्वचन सुनकर भी कृष्ण चुप रहे । परन्तु जब शिशुपाल ने युद्ध का  आवाहन किया तो कृष्ण ने सोचा कि अब चुप रहना  भीरुता होगी  अत:श्री कृष्ण ने पहले तो उसकी  सारी  करतूतें सभी  आये हुए राजाओं को सुनाई । कहा कि मैंने  फूफी के कहने पर  इसके सौ अपराध क्षमा किये ।  आखिर  क्षमा की भी हद होती है ।  हम प्रग्ज्योतिश गए थे इसने पीछे से द्वारिका जला दी । मैंने  अब तक फूफी के कहने पर इसको कुछ नहीं कहा  पर आखिर कब तक चुप रहूँ । यह  तो  युधिष्ठर का  धर्म -साम्राज्य ही  चौपट करना  चाहता है । यह  दखलन्दाजी  असहनीय है ।
  श्री कृष्ण द्वारा  सारी  बातें  सुनकर  अन्य राजा भी उससे  नफरत करने लगे ।
लोकमत के आते  ही  श्री कृष्ण का  सारा  संकोच ख़त्म हो गया । उसी  समय  उन्होंने  शिशुपाल का सिर सुदर्शन चक्र से  काट  डाला ।
आर्य समाज  का नियम    गुरुवर दयानन्द जी ने बनाया है  ।
सबसे  प्रीति पूर्वक धर्मानुसार   यथायोग्य  व्यवहार  करना  चाहिए ।
            ॐ  शान्ति 

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