Friday, 4 July 2014

वैराग्य की चमक Astonishment of Asceticism

एक  युवक ने  किसी    विरक्त संत  से पूँछा कि आप इतने  विरक्त  कैसे रहते हैं ।
क्या  आपका मन संसारी  वस्तुओं को  भोगने को  नहीं करता  ?  घरवार छोड़कर  एकान्त में  रहना क्यों  पसन्द  करते हैं ।
संत  ने  कहा  युवक ! तुमने बहुत  गहरा प्रश्न किया है । वस्तुत;  वैराग्य एक बहुत महत्वपूर्ण  विषय है ।जीवन  क्षणभंगुर है । हर व्यक्ति को  मृत्यु की  घटना का  सामना  करना करना पड़ता है ।  इस सम्बन्ध में एक प्रसंग सुनो ।
       एक  व्यक्ति  किसी  सिद्ध  महात्मा  के  पास  पहुँचा और बोला  महात्मा जी मैंने  आपके  बारे  में  बहुत  कुछ सुना है  क्या  आप   मुझे  भी  कुछ  सलाह देंगे
जिससे  मेरा  जीवन  सुधर  जाये   । संत  ने उस  व्यक्ति  को  एकटक  देखा  और  कहा  कि  तुम्हारी  मृत्यु  आज  से  ठीक  सात  दिन  बाद हो  जाएगी ।
अब तो वह व्यक्ति  सुनकर घबरा गया । संयमित होकर बोला  स्वामी जी  क्या आप  व्यंग्य  कर  रहे हैं या सत्य कह रहे हैं ।
साधू---व्यंग्य का तो प्रश्न ही नहीं है  ।मेरे पास जो ज्ञान है उसी  को  बता रहा हूँ  अब तो वह साधू के चरणों में गिर गया और उपाय  पूछने लगा ।
साधू ---उपाय कोई नहीं  है ।जो तुम्हारे  जरुरी काम  हैं उन्हें शीघ्रता से कर डालो।
           वह  आदमी घर  जाता है  और अपने को एक कमरे में बन्द कर लेता है
वह चिन्तन करता है  कि  मेरे  बाद  मेरे  परिवार  का  क्या होगा  ।मेरे  व्यापार  का  क्या  होगा ।  मेरी  प्यारी  पत्नी  जो  मुझे  इतना  प्यार  करती  है  मेरे  विना  कैसे  रहेगी ? अबतक  मैंने  क्या क्या  अच्छा  कार्य किया है ।जो भी कार्य किया  सकाम  भाव से काम किया ।उसमें भी  मेरा स्वार्थ  था कि  बदले  में  मुझे कुछ मिले ।
       इस चिंतन में उसे कुछ बोध  हुआ । सोचा  जो  होना है सो तो  होकर  रहेगा क्यों न  घर  वालों  को  अजमा  लिया जाये  की  कौन कौन  मुझे  चाहता है । सो उसने सबको बुलाया और साधू वाली  बात  बता दी ।सुनकर  सभी  रोने लगे ।
अब उसने  एक चाल  चली । कहा साधू ने मुझे एक बूटी दी है जो कोई इसे खा लेगा  तो   उसके  जीवन के कुछ वर्ष मेरे  जीवन में आजायेंगे ।
सभी को अपना  जीवन प्यारा लगा ।बेटा  बोला  मेरे  बच्चे  छोटे  छोटे है मुझे  उनका  भरण पोषण  करना है  । पत्नी बोली  आपका  सारा काम मैं ही  किया करती थी  मेरे  मरने के  बाद  आपकी  सेवा  कौन करेगा।  बेटी बोली  पापा  मैं तो  पराई  अमानत हूँ  । सबने  अपना अपना  निर्णय सुना दिया । 
बेटा बोला  पापा आप हमारा धन का बंटबारा  कर  जाओ  पीछे  कोर्ट कचहरी के कामों  में  दिक्कत पड़ेगी । पत्नी बोली मेरे नाम  की  सारी  जायदाद के  पेपर्स मुझे  देदो  । बेटी बोली  मेरा  भी  हिस्सा  दे  जाओ ।
  सुनकर  वह  सन्न  रह  गया । पता  चल  गया  कि  उसे  कोई  नहीं  चाहता  सब को  धन  चाहिए  । अब  उसने पैतरा बदला    जोर  से  बोला  अब कोई  मेरे  बीच  में न  आना  अन्यथा  हाथ  काट  दूँगा ।  सारा  धन  गरीबों  अनाथालयों को  दान  में  देकर  वह    सन्यासी के  पास  आया ।
वह व्यक्ति  सात  दिन तक  मृत्यु की  प्रतीक्षा  करता रहा । पर  जब  मृत्यु नहीं
आई तो  उसे  आश्चर्य हुआ क्योंकिमृत्यु  को  तो  कोई  टाल नहीं सकता ।अब वह
साधू के  पास आया और सन्त को सारा वृतान्त सुनाया कि परिवार वालों को मैं नहीं मेरा धन  चाहिए ।
साधू---अच्छा  सात दिन में  और  क्या क्या किया । अच्छा भोजन किया  ?नहीं  अच्छा रामा  भोग  किया  ?  नहीं । क्यों ?  क्योंकिमुझे  सत्य  दिखाई  दे  रहा था  । 
साधू---आपको  आपके  प्रश्न  का जबाब  मिल गया । आप समझ गए  होंगे  कि मैं  इतना  विरक्त क्यों  हूँ ।  संसार  के  पदार्थ  नश्वर  हैं  लोग  स्वार्थी  हैं  । यहाँ  कोई  किसी  का नहीं  । सब  मतलब  की  दुनियां है ।  मृत्यु  का डर  हरेक  को  होता है । जप तप दान  पुन्य करो  ईश्वर  का  भजन  करते  रहो  जब तक  जीवन है । मृत्यु से  मूर्ख  घबराता है  ज्ञानी  को पता है की    आत्मा  शाश्वत  है ।
स्वर्ग  भी  यहीं  है  नर्क  भी  यहीं है  ।  प्रसन्न मन  स्वर्ग  है  दुखित  मन  नर्क  है ।  

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