Tuesday, 6 May 2014

secret of life

मानव शरीर  तीन  चीजों  का  जोड़ है ।  आत्मा  मन  देह ।
आत्मा  और  देह  के बीच  है मन । मन  सदैव  घड़ी के  पेंडुलम  की  तरह डोलता रहता है ।  वह  स्थिर  नहीं  होता । सन्यासी इसको  अभ्यास  द्वारा  रोक  पाते हैं ।
आत्मा भी  शरीर में  रहती है ।यदि  मन  शरीर की  छाया में  चले तो  व्यक्ति संसारी  होता है    और  यदि  आत्मा की  छाया में  चले  तो  सन्यासी  बन  जाता है । मन  की  अपनी  कोई  धारणा नहीं कि  यह मत  करो  या वह  मत करो  ।  शरीर के पीछे  लग  जाए  तो  शरीर की  गुलामी  करता रहेगा ।और  आध्यात्मिकता की  ओर  मोड़ दो  तो  मोक्ष  प्रदाता बन जाता  है  ।
आत्म  तत्व  की  भी दो  दशायें  होती  हैं ।  एक  चित्त   दूसरी   चैतन्य  ।
           आपने  पानी  की तीन  अवस्थाएँ  देखी हैं ---एक  पानी   दूसरी   बर्फ
तीसरी  भाप ।
    तो  ऐसा समझो कि  चित्त  पानी है ।  पानी  में  कोई  भी  रंग  डाल दो  वह उसी  रंग का  हो  जाएगा  यानि  चित्त पर  परिस्थिति  का  प्रभाव  जैसा भी  पड़ता है  वह  अच्छा बुरा  दौनों  तरह  का हो  जाता है ।  अब  आत्मा  और  चित्त  का  पारस्परिक  सम्बन्ध है  चित्त  जैसा  दिखाता  है  आत्मा  तो  दर्पण है  उसमें  वही  प्रकट हो जाता है । आत्मा तो  शुद्ध  बुद्ध  निर्मल ही  है  परन्तु  उसमें
परछाई   जो  दिख  रही है  वह  किस  रूप  में है  यह   विशेष  बात  है ।
         तो  जिसको  हम  चित्त  कहते हैं  वह  पानी है ।  पानी  का  बहाव  सदैव  नीचे  की  ओर  होता है । वह  अधोगामी है  ।
   हमारा  शरीर  बर्फ  के  समान  ठोस  है  ।इसकी  अपनी  कोई  सत्ता नहीं  होती  ।  शरीर का  आत्मा  के  साथ  गहरा  सम्बन्ध है जिसको   साइकोसो मेटिक  relation  कहते हैं । मन की  शक्ति  से  शरीर  का संचालन  होता है ।जैसा  मन  होता है  वैसा ही तन होता है । मन  श्रेष्ठ  तो  तन भी  श्रेष्ठ  ।
और  आत्म  तत्व के  विना  शरीर  निर्जीव  होता है  आत्म तत्व  ही  जीवन  दायी  शक्ति  है जो  शरीर  को  जीवित  रखती है ।
                    अब  आत्मतत्व  के  बारे  में  बतलाते  हैं  ।  जिसको हम  आत्मा कहते हैं वह  भाप है  । यह वही  पानी है  जो  तपश्चर्या से  तप  से  भाप  बन  गया था ।वाष्पीभूत होगया था ।उड़ने लगा  ऊपर  की  तरफ  --तो  यह  ऊर्ध्गामी है  ।  नीचे  चले तो  संसार है   ,   ऊपर  चले तो परमात्मा है ।  और  ऊपर  चलने  में  जिसे  रस  आ  गया  वह  मयूर  बन क्र  नाचने  लगता  है ।
वह फिर संसार में  नहीं  लौटता  ।
जैसे जब  फागुन  आता है तब  फूल  खिल  जाते  हैं गन्ध  तैरने लगती हैफिजा में
ऐसे ही एक भीतर  का  फागुन  भी  गदरा  जाता है । और  बोध की  खिडकी खुल जाती है ।

No comments:

Post a Comment