Tuesday, 11 March 2014

conversation of knowledge बोध वार्ता

जीवन का  एक  अनुभव  अपने में  डूबना है  अपने बारे में सोचने से हमें अधिक शक्ति मिलती है  । हमें  अधिक  ज्ञान  मिलता है बुद्धिमत्ता तथा  सुझबुझ  की   बृद्धि  होती है । हम एक अदभुत  चीज हैं  इसका पता चल जाता है ।इससे  समस्याओं से  छुटकारा  मिल  जाता है ।
     अपने  होने  का सुख  अत्यधिक होता है । स्वयं के प्रति निष्ठावान होकर  सरल होने  का अलग  आनन्द है । केवल कल्पनाओं में अपने को मत उलझाओ।
अपनी  गुणवत्ता को  महसूस करो ।  आपके विचारों मेंकुछ उत्पादकता हो  कुछ्
  सार्थकता हो । हम  सोने का  इतना  आदर    करते हैं  उसकी  प्रमाणिकता से ।
शुद्धता से  ।  और यदि उसमें कुछ अशुद्धि  होती भी  है  तो उसे हम अग्नि में जला कर  शुद्ध  कर  लेते  हैं । ऐसे ही  इन्सान  को भी  अपनी  भावनायें तथा विचार  शुद्ध  रखने  चाहिए  । 
       जब हम  अनित्य को  नित्य मान  लेते  हैं   तभी हम  दुखी  हो  जाते   हैं  जैसे ही  हमें  ज्ञान का  प्रकाश  मिलजाता है  हम  वास्तविकता को  समझ लेते हैं
ध्यान से  हमें ज्यादा शक्ति मिलती है ।  दिव्य  शक्ति  बहती है  यह  अनोखा  अनुभव है ।  अध्यात्म  ज्ञान  हमारी  अज्ञानता  को  मिटाता है । अविचार से अविवेक से    जो मनो रोग अथवा  व्याधियाँ उत्पन्न  होजाती हैं वह अपने  आत्म स्वरुप के  याद आते ही  समाप्त हो जाती हैं । जब हमें अपने  होने  का ज्ञान होगाताभी हम आनन्द  और  सरसता का अनुभव कर  सकेंगे।  वस्तुओं से  आनन्द  प्राप्त नहीं  होता स्वत: ही प्राप्त  होता है  । "मन  चंगा  तो  कठौती में  गंगा  "  यह  आंतरिक  अनुभव है ।  आध्यात्मिक  साधन हमें  पूर्णता का  अनुभव कराते हैं । तृप्ती का  आनन्द अद्भुत है। अतीन्द्रिय है जो  चित  चेतना  से  अलग का है। यही सच्चा साधन सुख का है ।
पार्वती ने  शिव से  सच्चे  सुख  का  राज  पूछा था     शिवजी ने कहा सच्चा सुख छूकर या  चख कर  नहीं लिया  जा  सकता ।"उमा  कहहुं  निज  अनुभव  अपना  सत  हरी भजन  जगत  सब  सपना । " 
जग का सुख  कमल  पत्र पर पानी  ठहरता है  उतनी  देर  का है ।जैसे  भाप   बना पानी  बर्तन  में  वापिस  लाना  मुश्किल है  ऐसे ही  संसार  के  सारे  सुख  खो  जाते  हैं   ।  यह  सुख  आपको  तभी  मिलेगा  जब  आपका  आध्यात्म  पक
जाता है ।  आत्म  निरीक्षण  करो ,कभी  अपने  में ढूढ़ कर देखो ऐसा तभी  होगा  जब आप किसी  गुरु  की  समीपता पायेंगे ।
  मोह से बचो  "मोह  सकल व्याधियों का  मूला  "मोह को छिन्न भिन्न  करदो
यही  Root  cause . है  । हम  मोह  अहंता ममता आकांक्षा  कामना के ताने  बाने  से  अपना  जन्म  बुन  रहे हैं  । पूर्व में  पकाया  प्रारब्ध  हमारा  वर्तमान  है।
जो  बड़े  बड़े  सन्यासी  हुए  है    वे  संसार  की नश्वरता को जानते थे    ऋषभ  देव नाम के  एक  चक्रवर्ती राजा थे  उनका  समूची  पृथ्वी पर  राज्य था  वे  संन्यासी  न  बनते  यदि संसार का  सच न  जानते ।
सच  जानने निकलो  तभी  आपको   पूर्णता  का   अनुभव  होगा ।

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