Thursday, 13 March 2014

A Glance at Saint's life संतों के जीवन पर एक नजर

जो  व्यक्ति  अपने  आप  में  ही   सन्तुष्ट  होता है उसकी कभी  हार  नहीं  होती ।
जो  भीड़ के  साथ  रहता  है  वह  अपनी  आत्मा को  गँवा देता है ।जो  लोग जीवन  के  कष्टों या  समस्याओं  से  बचकर    जंगल  की  शरण लेलेते हैं  वे कोई  अक्लमंदी का  काम  नहीं  करते । कुछ लोग  ईश्वर  को  प्राप्त  करने  के लिए गुफाओं  में जाकर बैठ जाते हैं यह परमात्मा प्राप्ति का  कोई  ढंग  नहीं  है
परमात्मा तो  चारों तरफ फैला हुआ है  । चाँद सितारों  में  फूलों में इन्द्रधनुष  के रंगों में  वही  तो  है ।
    असल में  तो  गुफाओं  में  बैठने  वाले  साधू  जड़  होते  है  वे  बुद्धू  होते हैं
वे लकीर के फ़क़ीर  यंत्रवत्  जीते  हैं  ।  वे ऐसे  जीते हैंजैसे कोई  मुर्दा  जिए ।
जो  आदमी  जितना  मुर्दगी  से जीता है उसे  हम  उतना ही बड़ा सन्त कहते हैं ।
   हम  सन्तों को  सन्त क्यों कहते हैं  क्योंकि  वह  उपवास करता है  नंगा रहता है  , अपने को  सता रहा है ।  जैन मुनियों  को  देखा है  क्या  करते  हैं ?  वे  केश  लुञ्चन  करते हैं भीड़  इकट्ठी होकर  देखती  है  की अहा  !कैसा  त्याग है
         अरे !!नंगे  तो  पशु भी रहते हैं । और उपवास  तो  त्याग  का  कोई  ढंग  नहीं है । लोगों को  भ्रम में डाल कर अपनी  लीला  दिखाते  है । कोई  काँटों  पर सो  रहा है  तो कोई  पैर उलटे  सिर  के  बल  खडा है ।यह  तो  महँ मुर्खता है ।। बुद्धि   मानी  तो  पैरों के बल खड़ा  होने में है आराम  दायक  बिस्तर पर  सोने में है ।लेकिन  हम  इन क़दमों  का सम्मान करते हैं ।
  बाल   नोंचना   जैन  मुनियों का  कोई  करिश्मा  नहीं  है  । स्त्रियाँ जब  गुस्से  में  होती  हैं   तो  अपने  बाल  नोंचातीं  हैं। तो बाल  नोंचना  विक्षिप्तता का  लक्षण है ।  लेकिन  स्त्रिओं  को  कोई  नहीं कहता  कि तुम  त्याग  कर  रही  हो ।तपश्चर्या कर रही हो ।क्रोध में खाना  नहीं  खातीं ।  यानि  हम  उनको  पुराने  समय  की सत्याग्रही  कह   सकते  हैं । 
   महात्मा  गांधी  ने  भी  यही स्त्रियों  की आदतें  दुहराई   और इन्ही  आदतों के  कारण वे  महात्मा बने । बहुत  से सर्वोदयी  महात्मा  मुर्गे  खाते हैं। असल में  जब कुछ जबरदस्ती  आरोपण किया   जाएगा तो पीछे के  रास्ते से  जीवन में  झूठ  आ  ही  जाएगा ।   अब  संतों को  सिखाया  गया है की  ब्रह्मचर्य ही जीवन है  । परन्तु  होता क्या है  ? उनकी कामवासना  भीतर हिलोरे  ले रही होतीहै इसीलिए तो दुनियाँ के सन्त  राम नाम की  चदरिया  से अपने   मुखौटे  ढके रहते हैं । 
समाज ने सन्त नाम  के आदमी को उलझन में  डाला है  आदमी को  फाँसी  लगा दी है । उसका  जीवन  अकारण ही  संकट में  डाल दिया है ।जिए  तो  मुश्किल  न  जिए तोमुश्किल ।
सन्तों को  चाहिए  की वे  अपनी  निजता से  जियें । अपनी  मौज से जियें यही  असली संन्यास है  । अपने  मन में भ्रम  न  पालें  कि   वे  गलत हैं यदि कुछ गलत हो भी तो  भीतर  सही  भी  छिपा हुआहै । । यह  jiवन  जो मिला  है यह शुभ है । उसका सम्मान करो  । इसके  अतरिक्त  आत्म निरिक्षण  करो कि जोकुछ उनके अन्दर  अनगढ़  है उसे  सुधारें  उसे  मूर्ति  का  रूप दें । यह  कार्य ध्यान  से  पूरा होगा । 
जिसने  जीवन  जाना वही  आनन्द  जान  सकता है ।एक बार  जन लिया तो वह कभी न जन्म  लेगा न मरेगा । वह  जन्म से पहले भी था  और  मृत्यु के  बाद भी  रहेगा ।    फिर उस  जीवन  के लिए  गाया जाएगा  ------
    निरर्थक  टुकडा  शीशे  का   हाथों  का  कंगन  बन  जाए ।सतसंगत  और  विमल  मति  से  अनगढ़ मन  कुंदन  बन  जाये ।
जीवन का  कल्याण  भरा है  केवल  संतों की  वाणी में
ऋषि   दयानन्द की संगति से  मुंशीराम  श्रद्धानन्द बन  जाए
जैसे---सूरज की किरणों से  मिलकर  अगम  सिन्धु  का खारा पानी
         मोती बने  कपूर  सुगन्धित वर्षा  जल  मीठा बन  जाये ।  इति

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