Thursday, 6 February 2014

सुख -दुःख , ख़ुशी -गम का परिवर्तन

मेरा  एक मित्र  मुम्बई से  देहली मुझसे मिलने आया ।मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई उसे देखकर । हमने  दो  दिन  खूब  बातें की । फिर मुझे अपने ऑफिस जाना था ।मैंने उससे पूछा की वापिसी का टिकट कब का है ।वह बोला मैं तो यहाँ  दस पन्द्रह दिन रहने को  आया  हूँ ।अबजो ख़ुशी थी वह  दुःख में बदल गयी।
    मेरे  पडोसी के  पांच वर्ष के  बालक  का  अपहरण हो गया । बच्चे की माँ का रो रो कर बुरा  हाल था बार बार बेहोश हो रही थी  । दो दिन बाद पुलिस की मदद से बच्चा  मिल  गया  । बच्चे को  देख कर  माँ को  इतनी प्रसन्नता हुई कि  वह बार  बार बच्चे को अपनी  छाती से चिपका रही थी  ।  घंटे भर बाद  जब वह
शान्त हुई  तो  बच्चे से बोली  जाओ  बेटा  खेलो ।
        उपर्युक्त  घटनाएँ  बता रही हैं  कि  जिसे हम  सुख  समझते  हैं  उससे हम  बहुत  जल्दी  उकता  जाते हैं और ज्यादा  देर  रहने  पर  वही  सुख  दुखदायी  प्रतीत  होने  लगता है । हमें  रसगुल्ला बहुत पसन्द है । एक खाया  दो  यतीन  खाने  के  पश्चात  बस  बोल जाते हैं   और  यदि  खाते ही गए  तो फिर  डाक्टर की शरण  में  जाना  पड़ेगा ।
                 सारांश यह है की  जो  वस्तु  हमें  सुख  देती  है  एक  अवस्था के बाद वही  दुखदायी हो  जाती है  । सुख  और दुःख  का  यह  चक्र  चलता ही  रहता है । जैसे  साइकिल का पहिया जो  ऊपर था वही  घूमता हुआ  नीचे  आ जाता है । यह  संसार द्वन्द्वात्मक है ।यह सुख दुःख , राग विराग  प्रेम घृणा , जीवन मृत्युआदि   द्वन्द्वों के  आधार पर ही  चलता है । ये  द्वन्द्व एक  सिक्के के  दो   side की  तरह  हैं  जिनमें एक का  ग्रहण दुसरे का त्याग  नहीं किया जा सकता ।
    सच तो यह है कि   जीवन एक तराजू है ।  जिसका  एक पलड़ा  खुशो है और दुसरा गम । और हम  दौनों  के  बीच  में लटक  रहे  हैं  । ख़ुशी  और  गम  का  जो भी  पलड़ा भारी  होता  है हम  उसी ओर लटक जातेहैं । और  मजे की  बात यह हैकि   पलड़े  के ऊपर  नीचे होने  के    साथ  साथ हम  कभी  हँसने  लगते है
कभी रोने  लगते है  ।
      सन्त जन कहते हैं कि  सुख दायी- दुखदायी  परिस्थिति हमे  कुछ  शिक्षा  देने आतीं हैं ।हमें  उस वक्त    का  बुद्धि पूर्वक  सदुपयोग करना  चाहिए । संसार
के सभी  सम्बन्ध एक  दूसरे  की  सेवा करने  के  लिए हैं । हमारे  पास जो  कुछ  है  सब  सेवा के लिए है । यदि हम  निष्काम  भाव  से  सेवा  करेंगे तो  दुसरे के
मन में  भी  सेवा वृत्ति  जाग्रत हो  जायेगी । एक  बात  और  ----यदि  कोई वस्तु  जिसे  आप  चाहते हैं  वह  न मिले  तो  उसकी  इच्छा का त्याग कर दें और  मिल जाये  तो  ईश्वर  का  धन्यवाद  करें ।  इससे  आपको शान्ति  मिलेगी । भगवान् ने  हमें समय समझ  सामिग्री    और  सामर्थ्य  भरपूर दिया  है । अब हम अपने विवेक से  काम  लें । एक कामना होती है  एक आवश्यकता होती है  ।
शरीर  की  आवश्यकताएँ सिमित हैं  उनको  पूरा किया  जा सकता है । पर  कामनाएं  अनन्त हैं  एक पूरी  करते  ही  दूसरी  उठ  खड़ी होती है कामना दुष्पूर हैं । कामनाएं  ही दुःख  का  मूल  हैं । कहते  हैं*************
       दुनियाँ  जादू  का  खिलौना  है  ,मिल  जाये तो  मिटटी है  खो  जाए तो  सोना है ।"  यह तो   हम सबका  अनुभव है कि जो  चीज  हमारे  पास है उससे  हमें    सन्तुष्टि नहीं मिलती  आगे सागे  और और  की  आकांक्षा  करने  लगते हैं ।
  साधको--+-- संसार एक मन्च  है  और  हम  सब उस  प्रभु की  कठपुतली हैं  वह   जैसा  चाहता है  खेल  खेलता है -- सुनो सन्त कह  रहे हैं -----
ये  मानव  जीवन  है  नाट्य  शाला  विधाता  अभिनय  दिखा  रहा है
कभी  हँसाए कभी  रुलाये वह खेल  अपना दिखा रहा है ।
इस खेल  में   मानव बना  खिलौना । साधो  मानव बना खिलौना  ।

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