Friday, 14 February 2014

यह भी नहीं रहेगा ।

एक बार  बादशाह  अकबर ने  बीरबल से  एक   प्रश्न   पूछा    ,  बीरबल  !कोई  ऐसी बात  कहो जिससे   दुःख  सुख  में बदल जाए  और सुख  दुःख  में  बदल जाए । बताओ  ऐसी कौन सी  बात  हो  सकती है  ?
   बीरबल ने कहा  जहाँपनाह  ! वह  वाक्य है  "यह  भी नहीं   रहेगा  "।इसका अर्थ है  कि  रथ के   पहिये की तरह सुख दुःख  आते  और  जाते   रहते हैं। यदि सुख  आजाता है  तो  वह भी  स्थायी  नहीं  रहता  और जब  दुःख  आता है तोवह भी सदा के लिए नहीं रहता ,थोड़े दिन बाद वह  भी ठीक हो जाता है ।
असल में  सुख  ही दुःख में  परिवर्तित  हो जाता है ।  ज्यादा  कामनाएं   ज्यादा  भोग  वासनाएं  व्यक्ति को  मानसिक    और  शारीरिक तौर पर बीमार  कर  देती हैं ।  हमारे पास  गाड़ी  है  परन्तु  पडौसी   की और भी  महँगी गाडी है  बस इसी बात से हम  दुखी हो जाते हैं । कोई हमसे  आगे कैसे  निकल  गया  यह बात  भी हमारे  दुःख  का  कारण  हो  जाती है । किसी  कवि  ने कहा है -----------
जग  पीड़ित  है  अति  सुख से  ,जग  पीड़ित है अति  दुःख से ।
दौनों  आपस में  मिल  जाएँ  , सुख  दुःख  से     दुःख  सुख  से
दूसरों  के साथ competition  व्यक्ति  को  व्यथित  कर देता है ।
संसार की रंगीनियाँ ये  चंचल  माया के जाल  मनुष्य को  इतना  उलझाते हैं  कि एक  एक को पूरा करते  करते वह खुद  पूरा हो जाता है ।
  भोगँ   न  भुक्ता  वयमेव  भुक्ता , तृष्णा न जीर्णा  वयमेव  जीर्णा ।
          महात्मा  बुद्ध   अपने  शिष्यों को  भिक्षु  बनाने  से पहले  तीन  महीनों  के लिए    श्मशान में रहने को  भेजते थे  । वे  वहां रहकर  जलती चिता देखते  थे चिता को  देख कर उन्हें  काया  की  नश्वरता का  पता  चलता था   संसार  की  असारता  का  बोध  होता   था  उन्हें   य्ह  अहसास हो  जाता था कि एक दिन  हमारी भी  चिता  जलेगी । तीन  महीने के बाद  वे  भिक्षु  बनते थे ।
    सचमुच में  यह  द्दुनियाँ  के  रंगीन  नज़ारे  सदा नहीं  रहते । यहाँ  खुशियाँ  हैं कम    वेशुमार  हैं  गम  , एक  हँसी  और  आसूँ हजार ।  जय  पराजय  हानि लाभ  सफलता  असफलता  का  चोली  दामन  का  साथ है  । मानो  तो  सुख  अन्यथा दुःख है ।  यह केवल  मन:स्थिति  की  अव धारणा है ।
          भारत वर्ष  में संसार की असारता का बोध  अधिक है   यहाँ के लोग  अर्ध नग्न  भूखे पेट  रहना   और   ईश्वर चिंतन करना    सुख  सुविधाओं  में  रहने से बेहतर समझते हैं इसीलिए  यहाँ  साधू  संन्यासी  संत  महात्मा  शाश्वत  जीवन  की  खोज में  रहते हैं ।  जबकि  पाश्चात्य  देशों में  शरीर  प्रधान  समझा  जाता है     इसीलिए  वहाँ विज्ञानं की  बहुत उन्नति  हुयी।
हमारे जीवन  में  शाश्वत क्या है  ?    केवल   दृष्ट।  साक्षी होना  । वही साक्षी है
जो  जाग्रत में भी रहता है   ।  सोते समय वही स्वप्न  देखता है और  अँधेरे में  भी  अपने होने का  अनुभव  कराता है इसको  ही  आत्मा  कहते हैं ।

No comments:

Post a Comment