Sunday, 5 January 2014

पानी में मीन पियासी

पानी  में  मीन प्यासी  मोहे  सुन सुन  आवे  हाँसी  ।कबीर  के  इस    दोहे में व्यक्ति  की  तृष्णा   की  ओर इशारा है । सांसारिक  वासनाएँ मानव की  तृष्णा  को  और  अधिक  बढाती  हैं ऐसी  स्थिति  में  दुखी  मानव परमात्मा  से  प्रार्थना ही कर सकता है  कि  हे  परमात्मा  मुझे सुखी  कर ।
           हम  इस  संसार में  इतने उलझ  गए हैं कि परमात्मा के  सच्चिदानन्द  रूप  का  अनुभव ही नहीं कर पाते । हम   सर्व व्यापक  परमात्मा  के   सतत  सानिध्य में  रहते हैं  तथापि परमात्मा  के उस  आनन्दसे अछूते  ही रहते  हैं   ।
जिस प्रकार  पानी में सदा रहने  वाली  मछली  पानी  से  अनभिज्ञ  रहती है जल से  वियुक्त  होने पर  पानी  के  महत्व  को  समझ पाती है  बिना  पानी  के  त ड्प कर  मर जाती है  ऐसे  ही  ईश्वर  आनन्द  से   वंचित   अभागा  जीव संसार से  प्यासा  ही  विदा  होता  है  
       एक  कवि  ने  लिखा  है  -----आनन्द  स्रोत   बह  रहा फिर  भी  उदास है।        अचरज  है  जल  में रहकर  भी  मछली  को  प्यास  है  ।
  भक्त  कहता है की  हे  प्रभो  !मुझमें क्या  आपके  लिए  प्यास  पैदा हो सकेगी ?
  मैं  भी  क्या  आपके  दर्शनों के  बिना  संसार  का  आकर्षण  समाप्त  हो  पायेगा
क्या मुझे भी  आपकी  प्राप्ति  हो  जाने  के  पश्चात्   यह  जग   आपके  सौन्दर्य
जैसा  आकर्षित  लगेगा  । प्रभो  ! मेरे  क्लेश  भी  तभी  कट  पायेंगे । 
यह जगत  आपने  जीवों  के  लिए  ही  बनाया है । यह  हरी  भरी  वसुन्धरा
यह मीठे रसीले फल   , कल कल करती  नदियाँ     उत्तुंग  पर्वत  ये  धन  धान्य  से  भरे  खेत    फूलों पर  मंडराते  भोंरे    रँग  बिरँगी  तितलियाँ  आपकी  उपस्थिति का   ही  बोध  करा  रहे  हैं  ।  सुनिए  कुछ  पंक्तियाँ--------
    वो ही  आकाश  वन    गिरि  श्रंगों  में  है ।
  वो ही  नदियों  की तरल  तरंगों  में है
वो ही    छिपा  हुआ  सब  रँगों  में  है
  और फूलों  में है  उसकी  खुशबु 
ओम भू  ओम भू  ओम  भू  ओम  भू

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