Thursday, 30 January 2014

यज्ञ रहस्य

यज्ञ  करना  जीवन की  एक कल्याण कारी  प्रक्रिया  है ।   हवन  से  हर व्यक्ति को  चाहे बूढ़ा  बच्चा  जवान हो लाभ  मिलता है । पहला  लाभ  तो यही  है कि सब लोग एकत्रित  होकर  ईश्वर  को याद करते हैं ।ऐसे  समय में संसार के  दुःख तकलीफ  सब  भूले रहते हैं । यज्ञ से हम  सीखते हैं  सत्संग,संगति   करण तथा  दान  संगति करण यानि  संगठन  ,सत्संग  यानि  ईश्वर  ध्यान  ,दान  से  मतलब है हमारी  आहुतियाँ  ।हम  सामिग्री  में  मेवे  कस्तूरी  गुड़ चावल  तथा  अन्य   सुगन्धित वस्तुएं  मिला  कर  अग्नि क समर्पित करके साथ ही शुद्ध  घी को अर्पित करते हुए  कहते है  "इदन्न  मम  "  या नि यह सुन्दर समिधा  प्रकाशस्वरूप   परमेश्वर के लिए है  मेरे लिए नहीं  ।
      यज्ञ में पवित्रता का  बहुत महत्व है । हाथ में  जल  लेकर हम भगवान्  की
कृपा  का  अनुभव करते हैं जल का  आचमन करके  कहते हैं   भगवान्  हमारा  बिछौना है  वही हमारा ओढना है  अपनी  सत्य  निष्ठा से प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु  मुझे  सुयश दे  सम्पति दे ऐसी  श्री दे जो कल्याण  कारी  हो  ।
    अंग स्पर्श  करते हुए  प्रभु सें इन  अंगों में  शक्ति  देने की  कामना  करते  हैं ।
हमारी   ज्ञा नेन्द्रियन  तथा हाथ पैर  आदि   कर्मेन्द्रियाँ  सुमार्ग गामी हों यही भगवान् से  याचना की जाती है ।
      यज्ञ कर्ता भगवान्  से  कहता है कि  हे प्रभु  !यह मेरी  आत्मा  शुष्क    काठ
समान   आपके  लिए  ईंधन  जैसी है । मुझमें आप प्रकाशित होकर मुझे  प्रेरणा दो  जिससे मैं कल्याण मार्ग  पर  चल  सकूँ  ।  साधक  भगवान्  से हवन  के  माध्यम से आज्ञाकारी  पुत्र  पौत्र आदि से  प्रतिष्ठित  होकर  गौ आदि पशुओं  एवं  दूध घी  अन्न  आदि  खाद्य  पदार्थों  से समृद्ध  होने  की  याचना करता है ।
      परमात्मा  ज्योतियों की भी ज्योति है । सूर्य के  प्रकाश में प्रकाशित प्रभु  का  ही  तेज  ही  जगमगा रहा है ।  अग्नि की  ज्वाला में   परमेश्वर की ही  दीप्ति है
अन्त  में याजक प्रार्थना  करके कहता है कि   हे  ज्ञान  स्वरुप  परमेश्वर  हमें वही  मेधा  बुद्धि  दो   जो  मनुष्य  को  उच्च  पद पर पहुंचा  दे ।
प्रभु  हमारे दुर्गुणों को दूर  कर दो और  कोई एक  ऐसा  सदगुण दो जो मेरा कल्याण कर दे । प्रभु की  स्तुति  करते हुए  याजक  कहता है  कि  वह  परमात्मा
सर्व रक्षक, सर्व  व्यापक  ,  सर्वन्तर्यामी   ,  ज्योतिर्मय  , अविनाशी  , सृष्टि कर्ता
सर्वाधार , और  सुख स्वरुप है ।  वह  परमात्मा  ही  हमारे  शरीर  में  प्राण  वायु के रूप में  हमें  जीवन दे रहा है । वही अपान वायू  बनकर  हमें  स्वास्थ्य  लाभ  करा रहा है   वही  व्यान  वायु  रूप में  रुधिर  का समस्त शरीर में संचरण कर
रहा  है ।
अब हवन  निम्न  आशीर्वाद वचनों  से सम्पन्न होता है
शास्त्री  यजमान को  आशीर्वाद  देते हुए  कहता है कि   हे  यजमान  !यह भौतिक  अग्नि  शरीर  का  कल्याण करे  और आध्यात्मिक अग्नि  आत्मा  का  विकास करे। यज्ञ  फल  दायक हो   पूर्व कृत अपराधों  के लिए  प्राश्चित  की  प्रेरणा मिले
स्वस्ति न  इन्द्रो   वृद्ध्श्रवा   स्वस्ति नो  पूषा विश्ववेदा
स्वस्ति  नस्ता क्श्र्यो  अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पति  दधातु  ।

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