Wednesday, 29 January 2014

अग्नि स्वरूप भगवान् की स्तुति करो

यज्ञ  कर्ता  सर्व प्रथम अग्नि  का  एक  मन्त्र  गाता है 
"ॐ अग्नि  मीडे  पुरोहितं  यज्ञस्य देवमृतिवजम्  होतारं  रत्न धातमम  "
इसका  अर्थ है कि हम  उस अग्नि स्वरुप  भगवान् की  स्तुति  करते हैं जो  महान है  सृष्टि का  रचियता  है पुरोहित है तथा यज्ञ कर्ता को रतनों का  दाता है ।व् ब्रहमांड   के   ग्रह  उपग्रह  को धारण करने वाला है   ।
     मन्त्र में पुरोहित  शब्द  आया है  ।  हम शुभ  कार्य  को  करने के लिए  किसी  पुरोहित को  बुलाते हैं । यज्ञ की  आग्नि  पुरोहित है  ,चाहे  यज्ञ हो  चाहे कीर्तन  सबसे पहले  अग्नि का आधान  करते हैं  दीपक  यज्ञ का ही  लघु  रूप  है  । प्रभु
का ही एक नाम  अग्नि है  ।परमात्मा के विभिन्न नाम हैं ।
              भगवान् को  अग्नि इसलिए  कहा  जाता है  क्योंकि वे हमारी आत्माओं  को प्रकाश और उष्णता देकर  उन्नति  के  पथ  पर ले  जाते  हैं ।अग्नि में  प्रकाश  होता है गर्मी होती है ।और  आगे  ले  जाने  का गुण होता  है ।   यन्त्रों में  बन्द  अग्नि की  गर्मी  हमें  सेंकडों  मील दूर  पहुँचा देती  है ।
          हमारे  शरीर  में जब तक गर्मी रहती है  तभी तक हम गति कर  सकते हैं
और जीवित रह सकते हैं  । अग्नि के इसी प्रकाश  गर्मी और  उन्नति की ओर लेजाने के गुणों से  ही प्रभु को अग्नि कहा जाता है ।
      भक्त  भगवान्  से  प्रार्थना  कर रहा है  कि  हे  अग्नि  स्वरुप  भगवन्  !  आपकी  कीर्ति सुनी  जाती है  मुझे भी   कीर्तमान करो  ।मुझे  भी  ज्ञान  दो  । 
हे  अग्ने  !तू शरीर का रक्षक है  मेरे  शरीर  की  रक्षा कर । मुझे  दीर्घ  जीवन दे
मेरे तन में  जो  न्यूनता हो  उसे  पूरा कर दो । प्रभु मेरी  बुद्धि  की बृदधि कर ।
ज्ञान  देने वाली भगवान् कीदिव्य  शक्ति  मुझमें  बुद्धि  का  आधान  करे ।
मेरी  प्राण शक्ति  भरपूर हो  ।  मेरी  ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ  बलवान हों ।
मैं  तेजस्वी बनूँ । मेरा  दुर्गुणों को दूर  करने  वाला   स्वाभाव  हो  जाए ।  मेरी
प्रजनन  शक्ति को  तेज पूर्ण  बनाये ।
  सारांश में  मेरी  यही तमन्ना है कि कि में  अग्नि देव  के  इन गुणों  और नामों का  प्रतिदिन  स्मरण करूँ  ।इसको  जपने वाला   निष्पाप हो  जाएगा  ।फलस्वरूप वह मोक्ष धाम  का  अधिकारी  हो  जायेगा ।वह  उस  अमृत के  सागर में नित्यप्रति  डुबकियाँ लगाकर आनन्द मग्न  रहा करेगा ।

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