Friday, 24 January 2014

मेरा गोपाल स्वामी

मैंने  पूछा  पपीहे  से  हे पपीहा  !   तेरा किसके विरह में ये तडपे जिया ।
होकर  मन में मगन  , लगी  किससे लगन  ,पीपी करता बता तेरा कौन पिया
  बोला  मेरा  पिया  है  वो ही प्रभु  ,ओम भू :ओम भू :  ओम  भू: ओम  भू:  ।
             वो ही  आकाश  वन  गिरि  श्रंगों  में  है 
वो ही  नदियों की तरल तरंगों  में है  ,वो ही   छिपा  हुआ  सब  रंगों  में  है 
और फूलों में है उसकी  खुशबू  ,ओम  भू:  ओम भू: ------- 
जग के कण कण में  प्रभु जी  तेरा  वास है  , पास उसके  है  जिसे  तेरा   विश्वास है   ।पक्षी गण  राग सुन्दर हैं  गाते  ,जिव  जन्तु  भी सिर को  नवाते 
राह तेरी  चला उसको  सुख  है मिला जो है प्यारा  तुही तूही है रक्षक  हमारा। 
अन्न जल  फल फूल  मेवा  कंद  नाना  जाती के,
                       हैं  रचे  जिसने  ज्मारे  ही लिए  सब   भांति  के
और  पशु पक्षी  मनुष्य  अनेक  विधि  जो  हैं  बने  ।
जिनसे चलते  काम काज  सदा हमारे  हैं  घने ।
है  झलक  जिसकी  सभी  चीजों में  जो  सब  ठाम  है
उस अगम  अखिलेश को मम  कोटि  कोटि  प्रणाम  है ।
चाँद सूरज  सितारे बनाये  धरती  आकाश पाताल सजाये
अन्त  पाया तेरा  पाया नहीं  पारवारा  तू ही  तुही है  रक्षक हमारा
ये जंगल  पर्वत सारे ये नदियाँ  नाले  सारे  ,सागर की  गहरी  धार  में  भगवान्  छिपा बैठा  है   ।
   उपर्युक्त  पंक्त्तियाँ हमें प्रभु  की  रचना  कुशलता  को बता  रहीं हैं  की उसने  किस प्रकार इस धरती पर  अपनी  कृपा  की  बरसात    की हुई  है  । हमें सुख
देने के लियेअपने   पूर्ण  पद की भी  व्यवस्था  कर रखी  है यानी  मोक्ष पद की  प्राप्ति  हो  जाती है ।  भगवान  इस प्रकार  भाँती  भान्ति   से हमारे  सुख  मंगल का  संविधान करके हमारी  रक्षा कर  रहे हैं  । जिसप्रकार   कोई  गोपाल  अपनी
गायों के  दाना  पानी   आदि का   प्रबन्ध करता है। वैसे ही प्रभु  भी  हम सब के लिए  आवश्यक   वस्तुओं का प्रबन्ध करता है ।
          अब हमारा  कर्तव्य बनता है की हम   उसी  की  आज्ञा में रह कर चलें ।
हे  मेरे  आत्मन  !तू भी उस  परम रक्षक की शरण  में  जाकर  अपने  आपको
अतुलनीय  मंगल का अधिकारी  बना ले  ।

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