Wednesday, 22 January 2014

मन का खूंटा

एक बार  प्रयाग के कुछ  पंडितों ने  काशी    जाने का  प्रोग्राम  बनाया ।  आठ  नौ  पंडित थे  । सबने  एक  नौका से  गंगा पार जाने  का  प्लान  बनाया ।  एक  सहमति से  सबने  कहा  कि  रात  को  नाव  से  चलकर  सुबह   काशी  पहुँच  जायेंगे  ।   सब  रात को  चलने    को  तैयार   हो गए  ।चलने  से पहले  सबने  खूब  शराब  पी  और  नाव  पर सवार  होगये  । उनमें  से  जो  चप्पू  चलाना  जानते  थे  उन्होंने  चप्पू  चलाना  शुरू कर  दिया  ।  सभी लोग  खूब  मस्ती  में  झूम  झूम कर  गाना  गाने लगे  । रात भर  खूब  जशन मनाया  ।अब  प्रभात  होने  वाला  था  थोडा थोडा  उजाला  होने  लगा  ।  उन लोगों का भी  शराब  का नशा  उतरने  लगा था । उनमें  से  एक  बोला  शायद  हम  काशी  आ पहुंचे हैं  क्योकि कुछ  स्त्रियाँ गँगा  घाट  पर  स्नान  करने  आ  गई थीं ।एक  पंडित  ने  पहचाना  अरे  ये मेरी  घरवाली  यहाँ कैसे  ? सब  लोग  हैरान  होकर देखने  लगे
तब  एक  पंडित  की नजर  नाव  के खूंटे पर  गई  । वह  चिल्ल्या  अरे हम तो प्रयाग  में ही हैं  । हमने  नाव   का  खूंटा तो  खोलाही नहीं था ।
         हमारे  मन की  यही  दशाहाई । हम ईश्वर  को तो चाहते  हैं  पर  अपने मन को  संसार  से  अलग  नहीं करते ।  मन का स्वभाव  संसार में  लगने का है ।
यदि  हम  अपने  मन को  ईश्वर  भक्ति  में  लगाना  चाहते हैं तो हम को संसार से  लगाव  छोड़ना पड़ेगा । हमारा मन एक घोड़े  के  समान है ।जैसे    जब  घोड़ा  चलकर  थक चुका होता है  तब सारथी  उसे  खूँटे से  बांध देता है  उसी प्रकार  हमारा मन  भी  जब  जीवन यात्रा  में  प्रतिदिन के  संघर्षों  से  परेशान  हो जाता है उस समय  थके  हुए  और  निराश  हुए मन कोविश्राम देने  वाला खूँटा   भगवान्  है ।  हमारे मनके  घोड़े को बाँधने  वाली  रज्जु  प्रभु  भक्ति   से  भरी  हमारी  वाणियाँ  हैं ।जब हम प्रेम से भर कर तन्मय होकर  गद गद कंठ  से प्रभु  गुण गान करते हैं   तब  हमारा मन प्रभु के  साथ बन्ध  जाता है  ।उस समय हमारे मन की जो दशा होती है  वह  अद्भुत  है ।
घोड़े की  उपमा  इसलिए दी गई   है क्योंकि  घोडा  शक्ति  शाली  होता है।  हमारा मन भी शक्ति  का भण्डार है  ।यह  अच्छे  राह  पर चलता है तो मोक्ष भी  दिला देता  है  और यदि  सुमार्ग पर न चलाया  जाए  तो यह  सारथी को गड्डे में भी  गिरा  देता  है । इसलिए मानवो  !  अपने मन  रूपी  घोड़े  को प्रभु  भक्ति  के खूंटे  से  बाँधो।     वेद में  लिखा है   --------
प्रभो  जागते  हुए   सदा जो  दूर  दूर  तक  जाता है
सोते में भी   दिव्य  शक्तिमय  कोसों दौड़  लगाता है
दूर दूर  तक  जाने  वाला तेजों का  भी तेज  निधान
नित्य युक्त  शुभ  संकल्पों  से  ये  मन मेरा  हो भगवान्
                      जो जन  कुल  की  बागडोर  को   इधर  उधर  ले  जाता है।
                चतुर  सारथी ज्यों घोड़े को  उत्तम चाल  चलाता है
           सदा    प्रतिष्ठित  ह्रदय देश  में   विपुल  तीव्र गति  अजर   महान
   नित्य  युक्त  शुभ  संकल्पों से  ये मन मेरा हो  भगवान ।

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