Saturday, 4 January 2014

मैं न रहूँ माटी के घर मैं

सिद्ध  साधक  और  विषयी  ये  तीन  प्रकार  के  जीव  होते  हैं  । जीव  को  शिक्षा  देकर  साधक को  दीक्षा  देकर  तथा  सिद्ध को भिक्षा  देकर  संतुष्ट  करना  होता है  ।  सिद्ध  तो  स्वयं  ही  ज्ञानी है  । वह  आत्मा परमात्मा  को  जानता  है  तो  सिद्ध  लोगों  का कहना है  कि  आत्मा का  कोई  गुरु  नहीं  होता ।आत्मा स्वयम  साक्षी  है ।  अंतर्मुखी  होकर ही  उसको  जाना जा सकता है  ।आत्मा  ज्ञान  स्वरुप है ।  ज्ञान  को  ही  आत्मा  शब्द    का  दुसरा  नाम कह  सकते हैं
जो लोग  आत्मामें ही रमण  करते हैं  वे  कभी  कोई  गलत काम  नहीं  कर  सकते  ।  आत्मा  बोध स्वरुप है  ।आत्मा को  एक  शरीर  छोड़कर  दुसरे  शरीर  की  यात्रा पर  जाना  होता है  यानी  दुसरा चोला  धारण  करने के लिए ।
         तो  जो लोग   परमात्मा  को  आत्मा से बड़ा  जानते  हैं  वे  यथा  सम्भव  यही  चाहते  हैं  की  हमें  मोक्ष  मिले  यह  बार बार  का  शरीर  धारण  करने से  छुटकारा   हो  । इसी लिए  वे भगवान्  से  प्रार्थना  करते  हैं कि   हे  भगवान्  हमें  यह  मिटटी  का  घर न  मिले  ।यानी  यह  पञ्च   भौतिक्   शरीर  जो  नश्वर  है  हमें  न दे  ।  भक्त  कहता है की  हे  कृपालू  !  हे  न्यायकारी  !
                             "  मैं  अपने  शुभ  अशुभ  कर्मों के  भोग  के  लिए  इस  मिटटी के  घर  में रहने  के  लिए  मजबूर  हूँ    मेरा यह  शरीर  नश्वर  है जड़ है
प्र कृति  से  बना  है  । यह जड जगत   ही  मिटटी  से  बना  हुआ  है ।तब  इससे  मिलने   वाला  सुख भी  निकृष्ट  श्रेणी  के ही  होंगे   । कृपा  करो  कि मैं  जन्म  मरण  के  बन्धन  से  मुक्त  हो  जाऊं । "
        नश्वर  शरीर  की तुलना  मिट्टी  के  घर  से  की  गई  है ।  मिट्टी  से बना घर  और  मानव  का  पाँच  भौतिक  शरीर  दौनों ही नाशवान हैं  ।  इस शरीर  से मिला  सुख  चिर  स्थायी  नहीं    होते । सच्चा  आनन्द  भगवान्  की शरण में ही मिल सकता है । नि:संदेह्  हम  संसार  की उपेक्षा  नहीं  करसकते  ।क्योंकि  ब्रह्म  ज्ञान  हमें  संसार की  विद्याओं  को  पढ़ कर   अध्ययन  करके  प्राप्त  होता है   ।
          संसार के विषयों  का  सेवन तो  केवल  साधन के  रूप में करना  चाहिए
ठीक  दृष्टि से  भोगा  गया   संसार  बन्धन  का  कारण  न  होकर  मोक्ष  का  कारण  होता है ।  
        हे  प्रभो   !मुझे  इस  मिटटी  के  घर  से बचाइये  ।  और  मुझे  सुखी  कीजिये  । हमें  सुबुद्धि  दीजिये ताकि  हम  संसार के  विषयों में लिप्त  हो कर फँस न  जाएँ  ।

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