Monday, 30 December 2013

मैं क्या हूँ ? what am I

मैं क्या  हूँ  शंकराचार्य  जी  ने  कहा  है कि न  मैं  शरीर हूँ  न मन  हूँ  न  बुद्धि  हूँ    न  मेरे  विचार  मेरे हैं ।तो फिर मैं  क्या हूँ  ?
हमारे  पास  ऐसा कोई विचार नहीं जिसे मैं कह सकूँ  की यह  मेरा  अपना विचार है   यह हमारे  विचार  आये  हैं   परम्परा से शास्त्रों से किसी से  सुनकर या फिर पढ़कर ।  और मजा  यह है  कि हम इन विचारों को  अपना कहते  या  मानते  हैं
मैं  हूँ  या नहीं  -- यदि हूँ   तो क्या  हूँ  ?
        इस प्रश्न पर  मनीषियों  ने बहुत  खोज  की  है ।मेरे न होने  पर  तो किसीको  कोई  सन्देह  नहीं ।  सभी  कहेंगे  की  नहीं  मैं हूँ  ये  रहा  मैं । पर  आप  बता सकते  हो कि मैं* किसे  कह  रहे हो  ?
महात्मा जन कहते  हैं कि  हम  जो  श्वांस  लेते  हैं  वह भी  हमारी नहीं । ईश्वर    प्रदत्त  है  अस्तित्व  गिनती  के  श्वांस  देता हैपूर्ण होने पर जीवन समाप्त  हो  जाता है । 
तो जब  श्वांस  तक  आपकी नहीं  फिर विचार  और भी  सूक्ष्म बात है ।इस विशलेषण  में  ज्भ्म गहरे उतारते हैं तो हम पाते हैं कि "मैं  यह भी  नहीं  "मैं  यह  भी  नहीं  । आखिर  में सब  काटने  पर  कुछ भी नहीं बचता  तो  उसे  काटने  का  कोई उपाय नहीं  । फिर कोई सम्बन्ध नहीं रह  जाता  जिसे  तोड़ा जाए ।जो  कुछ  रह जाता  है  उसी को  उपनिषद  साक्षी  कहते  हैं 
समझने की बात है  यह  विस्तृत संसार  मेरा नहीं  , शरीर  मेरा नहीं , जीव  के  पलायन के  बाद सम्बन्ध  समाप्त  स्वर्ग नर्क की  कल्पना  भी व्यर्थ है ।जब  मेरा  मन भी मेरा नहीं तो फिर  मेरा कौन है जिसे  मैं अपना  कह सकूँ ।
       अब बताओ  मेरा  कौन  है  ?संदेह  होता  है कि फिर ( मैं  ) हूँ या  नहीं?
इसपर  संदेह  नहीं  किया जा  सकता । क्योंकि यदि  मैं कहूँ कि मैं हूँ या नहींतो
यह कहने के लिए भी मेरे  होने  की  जरूरत  है  । अन्यथा यह तो  ऐसाही  होगा
जैसे  कोई व्यक्ति  घर के भीतर  बैठा  हो  और  कहे  कि मैं  बाहर  गया   हुआ हूँ अभी घरपर  नहीं हूँ  । आप  थोड़ी  देर  बाद  आयें  तब मैं  आपको  मिलूंगा  ।
तो  उसका यह कहना  ही  उसके  होने  का  प्रमाण हो  जाएगा  ।अत:मेरे  होने  की  स्थिति    असंदिग्ध  है । इतना  तो  साफ़  है की  "मैं "  हूँ  ।यदि  हम  ध्रीर मन बुद्धि सम्बन्ध साँस विचार सब  हटाते जाएँ  तो  पता चलता है कि व्यक्ति मात्र  पर्त  दर पर्त ही नहीं  है  , पर्तों  के  भीतर  जो कुछ हैवह  पर्तों से  भिन्न  है  । 
आदि गुरु  शंकराचार्य  जी  ने   कहा  कि हम  क्या  हैं  सुनो  ------
अहम्  निविकल्पो  निराकार  रूपों    विभूव्याप्य   सर्वत्र  सर्व  इन्द्रियाणाम
सदा में  समत्वं न  मुक्ति  न  बन्ध  , चिदानान्न्द  रूपम शिवोहम्   शिवोहम्  ।

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