Thursday, 5 December 2013

हाय हाय ये मज़बूरी

             हाय हाय  ये मज़बूरी 
           पूनः   पुनः  जन्म  जरुरी  । "
  जबकि  श्रुति  प्रमाण  है  "न स पुनरावर्तते   न स पुनरावर्तते  ।  "
अर्थात्  मोक्ष  होने  पर मृत्युका कोई   भय  नहीं  ।गीता  भी  कहती  है  कि   
" जहाँ  जाकर  प्राणी नहीं  लौटता  वह  मेरा  परम  धाम है  ।  " श्रुति  में  दो  बार कहा है  कि  वह  यानि  प्राणी  मोक्ष  होने पर  दुबारा  जन्म  नहीं  लेता , दुबारा  जन्म  नहीं  लेता  ।
  
लेकिन  हकीकत  कुछ  और  ही है  ।    एक  जीवात्मा  से  मेरी  बात चीत हुई  ।
मैंने  उससे  पूछा कि  तुम्हारा  नाम  क्या  है  ?   तो  उसने  जबाब  दिया  कि  आप  मुझसे  न मेरा नाम  पूछो  न  परिवार    या ग्राम के  बारे में पूछो  ।क्योंकि  मैं एक  अपरिचित  देश  का  वासी  हूँ  ।  और अब  मुझसे  मेरा  काम  पूछकर
भी  मुझे  लज्जित मत  करना ।
मैं  अनादि  काल  से   अनन्त युगों से  किसी  दूर  देश   से  चलता  आ  रहा हूँ।
मुझे  तो   बस  यही  ज्ञात  है  ।मैंने  भी  अपने कई साथियों  से  पूछा  था  की  उनका  पता  ठिकाना  क्या  है पर  कोई भी   नहीं  बता  पाया  ।
हम सब  साथी  मिलते  और बिछुड़ते रहते  है और  काल  कुठार  का  शिकार  होते रहते हैं  । इससे ज्यादा हमारी  कोई पहिचान  नहीं  है  ।
    हाँ  हमारे  साथियों  में  जो  मोक्ष  प्राप्त  कर  लेता है  वह काल के  ग्रास  नहीं  बन  पाते ।
शेष  हम सब   आपस में  अपरिचित  हैं  कोई  किसी  को  नहीं  जानता । सारे ही प्रवासी  पथिक  हैं ।  संसार  में  जिन  आत्माओं  को  नाम  रूप  मिल  गया  है वे भी  जगह जगह   रह रहे हैं
  अब  उस जीवात्मा  ने  मझसे  ही  पलट कर  पूछा  ,  हे   जिज्ञासू  !तुम  जो इस  जगत को  अपना  मान रहे हो  सच  सच  बताना कि  तुम  यहाँ  कब  से रह  रहे हो  । एक  बात  बताओ  कि तुम ने अबतो  नाम  और रूप धारण  कर  लिया है  इससे  पहले  किस देश  में  वसे  थे  ।  उस  देश का  नाम बतलाओ  ।
      अरे  !यह  सब  उस  मायावी प्रभु  की  रचना  है    यह  उसका  जादू  का 
खेल  है  और हम सब  उसके  खिलौने  हैं  वह  जिसे  चाहता है  नष्ट    कर  देता है  जिसे  चाहे  नाम  रूप  के  वस्त्र   पहिना  देता  है  ।।
यह  संसार हमारे लिए एक  पड़ाव  है ।  शेष  जहाँ वह  हमें  भेजेगा  वह  सारे  पथ  हमारे लिए  अनजाने  हैं  । यह  रास्ते  इतने  दुर्गम    तथा  निर्जन हैं   कि यहाँ  किसी  भी  प्राणी  के  पद चिन्ह  भी  नहीं  मिलते  । अर्थात  हमारा  गर्भ  गुफा  में  जाना  या  फिर  मृत्यु  की  वेला में अनजान  कठिन    रास्तों से  गुजरना अत्यन्त भयंकर  होता  है । यहाँ जीव  को  अकेले ही  आना  जाना पड़ता है  ।
हे  जिज्ञासु  !  हमतो मुसाफिर हैं और  हमारे   जैसों  काकाम भी  यही  है कि मात्र  तमाशा  देखने  वाले  दृषटा  बने रहो ।  अपना  न  कुछ कहना न  कुछ  सुनना  बस  नीची  निगाह  करके  चलते  जाना  है  ।आगे  बढ़ते रहना  है  ।

      जब तक  हम  जीवों  को  आनन्द  धाम  परम  अविनाशी  नहीं  मिल  जाते
तब  तक  हमको  ऐसे ही  नाम  रूपका  चोला  धारण करके  सदा   प्रवासी बने  रहना  है ।  इसी लिए  संसार  को  मुसाफिर  खाना कहा  है  ।
  आता  है  इक  जाता है  पार  नहीं   हो  पाता  है ।

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