Saturday, 30 November 2013

यदि भगवान् तुम्हारा दोस्त बन जाये तो .....

  यदि  भगवान्  तुम्हारा मित्र बन  जाये  ..यह  कल्पना ही कितनी  सुख देने वाली है  और  सचमुच  ऐसा हो  जाए तब तो  ख़ुशी  का  क्या कहना  ।
हमारे  शास्त्रों  में तो  भगवान् को   "पितु  मातु  सहायक  स्वामी   " कहा  है
दोस्ती के नाम  पर तो श्री  क्रष्ण और अर्जुन  का  ही  नाम  आता है अन्य  किसी  का  नहीं  ।भगवान्  और  भक्त  की  बात  तो  अलग  है  ।परन्तु भगवान्  से  दोस्ती  तो  स्वयम  में  बहुत  बड़ी उपलब्धि  है  । मित्रता  के   सम्बन्ध केलिए
चाहिए  प्यार  और  समानता  ।
दोस्ती  समानता  के स्तर पर ही  होती  है ।फिर दोस्ती  जोड़ लेना तो  आसान  है
पर इसको निभाना ही   आन्तरिक  सद्इच्छा पर  निर्भर है।  दोस्ती  में  एक  दुसरे  पर  कुर्बान  होना  पड़ता है  ।समय  समय  पर  एक  दुसरे  की  मदद  करनी  होती  है  ।  दोस्ती पारदर्शी दिलों  कामिलन  होता है ।  तो  कर लें  आप  भगवान्  से  दोस्ती  । बनालें आप उसे  अपना  ......उसका सब  कुछ  आपका  हो  जाएगा  । जब भी  आप  उसे  याद  करेगे  वह नंगे  पैरों  दौड़ा  चला  आयेगा  ।भगवान्  स्वयम  कहते हैं.. "जब जब  भीर  पड़ी  भक्तों पर  देर नहीं  लगाऊं ।
        गरुड़  छोड़  वैकुण्ठ  त्याग  कर  नंगे  पैरों   धाऊँ  ।
खबर  नहीं  करूँ  अपनी   ।  मैं तो  हूँ  मित्रों  का दास   ।
सोचो  !भगवान्  ही  आपका हो  जाए तो फिर जिन्दगी   में बात  बन  जाए ।हर 
समय  प्रभु  की  छत्रछाया  ही  बनी  रहे । यह मित्रता  केवल एक ही  बार  होती  है   कृष्ण  सुदामा  की  दोस्ती  सहपाठी  केरूप  में  प्रसिद्ध  है  ।
   !आगे  चना गुरु  मात  दए  थे  लए  तुम  चाब  हमें  नहीं  दीने
   स्याम कह्यो  मुसकाय  सुदामा सों  चोरी  की  बान  में  हो  जो  प्रवीने  ।
यदि  तुमने उसे  अपना  सच्चा  दोस्त  बनाया  है  तो  यह तुम्हारे लिए  वरदान  है  । अर्जुन  ने  दोस्ती की भगवान् से   तो फलस्वरूप महाभारत  के  युद्ध  में  विजयी हुआ   ।  अर्जुन  का  रथ  हाँका  और  स्वयम  सारथि  बने   । श्री  कृष्ण ने    पाण्डवों  को हर  मुसीबत  से  बचाया ।।
सुदामा  की दोस्ती जग  प्रसिद्द  है   ।  सुदामा  की  गरीबी  हालत देखकर  तो  जैसे  कृष्ण  का  कलेजा ही  फटा  जारहा था। 
"हाय   महा दुःख  पायौ  सखा  तुम  आये  इते  न  किते  दिन  खोये ।
देख  सुदामा  की  दिन  दसा  करुना  करके  करुना  निधि  रोये  ।"
   फिर क्या  हुआ    रुक्मणी    कृष्ण की  पत्नी  के  मुख  से  सुनो  ....
"  खाय  मुठी  तीसरी  अब नाथ  कहाँ  निज  वास  की  आस  विचारी।
अर्थात्   सुदामा  द्वारा  लाये  चावलों को  दो मुट्ठी  खाकर भगवान  ने  उन्हें  दो लोक  का  राजा बनादिया  । यह है  भगवान्  की  दोस्ती  का उपहार  ।रुक्मणी को   अब  अपने   निवास को  बचाने की  चिंता होने  लगी ।ऐसे  हैं  भगवान् । 
मित्र पर  अपना  सबकुछ  लुटाने  को  तैयार ।  गीता में  लिखा  है  जहाँ  कृष्ण अर्जुन  जैसी  मित्रता होती  है  वहन  विजय  और  श्री  सदैव  रहती  है  ।

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