Monday, 4 November 2013

सुख शांति का साधन कीर्तन

  हम  जिन   शब्दों  का  उच्चारण  करते  हैं ,  वे  उसी  क्षण  समस्त  ब्रह्माण्ड  में व्याप्त  हो  जाते  हैं   और  सदा  के लिए  स्थायी  बने  रहते  हैं । शब्द  भी  ब्रह्म  की  तरह ज्योति  स्वरुप  हैं ।शब्द  रूपी  ज्योति  से  ह्रदय  का   अन्धकार  दूर  होता है  ।अत:प्रत्येक  व्यक्ति को  अपने  ह्रदय  में  विराजित  ज्ञान स्वरुप  प्रभु  से  आज्ञा  लेकर ही  वाणी  का   उच्चारण  करना  चाहिए  । कहते  हैं न कि  पहले  तौलो  फिर  बोलो  । इसका परिणाम यह  होगा  कि  वक्ता  और  श्रोता  दोनों के  लिए  कल्याण  कारी   सिद्ध  होगा ।कोई  झगडा  फसाद या तनाव  नहीं  होगा  ।
         जीवन  को  धन्य बनाने  वाले  शब्द   वही  हैं   जो  भगवान्  की  प्राप्ति  में  सहायक  होते हैं  ।हमारे  जीवन  का  चरम  उद्देश्य  भी  यही  है।  भागवत  में  स्वयम  श्री  कृष्ण जी  ने  कहा है कि  "पूर्व  जन्म  केसौभाग्य  से  जिनकी  श्रद्धा  मेरे  नाम  में  है   जो मेरी  लीलाओं   और  चरित्रों  को  सुनते  सुनाते  हैं  वे  ही  इस  योग  से  मेरी  प्राप्ति  में  सफल  हो  पाते  हैं  । जो मेरे  निरन्तर संकीर्तन  में  लगे  हुए  हैं   वे  योगी हैं मैं उनलका  शीघ्र  उद्धार  करता  हूँ ।
    इस  भौतिक संसार  में  आकाश  तत्व  की   प्रधानता  है ।  और  आकाश  का  गुण  शब्द  है  ।आकाश  के  देवता  भी विष्णु  भगवान्  हैं  वे  देवताओं  में  प्रधान हैं  । इनको प्रणाम  करने का  अर्थ  है  सभी  देवताओं  का  पूजन  और  नमन ।  " सर्व  देव नमस्कारम्   केशवं  प्रति  गच्छति  ।" 
      भग्वान के  नामों को  उच्च  स्वर   से  बोलने को   कीर्तन  कहते  हैं  तथा धीरे धीरे  मन ही मन बोलने को  जप को  कहते हैं  ।संकीर्तन  सभी  वर्ण  के  या  जाति  के  व्यक्ति  करने  के  अधिकारी  हैं  ।  पातंजलि  योग  सूत्र  में कहते  हैं कि मनुष्य  का  चंचल  मन अनायास  ही  कीर्तन करने  से  स्थिर  हो  जाता  है
      संकीर्तन  भगवान्  का  साक्षात  रूप  है  ।  ऋषि  मुनि  कहते हैं  कि  नाम और  नामी  अभेद  हैं  दोनो  में कोई  भेद  नहीं  है  ।जैसे  नर्तक  और  नृत्य   एकाकार  हैं ।अगर     नृत्य  है  तो  नर्तक  जरुर  होगा  ।ऐसे  ही   नाम  और   नामी  एक  ही  व्यक्ति  से  सम्बन्धित  हैं  ।  उदाहरण  रूप से......
राम  से  बड़ा  राम  का  नाम ।      राम  एक  तापस  तिय  तारी  ,राम  नाम 
असंख्य  मनुज  तारे   ।" 
कीर्तन में  हम  जिस नाम  का  उच्च  स्वर  से  गायन  करते  हैं  वह  प्रभु  का  साक्षात्  स्वरुप    हो  जाता  है  ।  हम  कीर्तन  क्यों  करते  हैं  ?  पापों  को  नष्ट   करने  की  शक्तिजो  भगवान्  नाम  में  है  वह  अन्य  किसी  साधन  में  नहीं  है
तन्मयता  से  कीर्तन  करनमें  भगवान  जितने  प्रसन्न होते  हैं    उतने  किसी  योगी  के  तप   से  भी  नहीं  होते  ।
विभोर  और  मुग्ध  होकर  गाने  और  नाचने    से  रसिक  विहारी  को  जितना  आनन्द  आता है  वह  सुख   और  आनन्द  न  वैकुण्ठ   वासियों  को  आता है  न
योगियों  के  ह्रदय  में आता  है  ।
भगवान्  स्वयम  नारद  से  कहते  हैं कि  हे  नारद  !
"  नाहम्  वसामि  वैकुंठे  योगिनाम्     ह्रदय न च ।
मद्भक्त  यत्र  गायन्ति  तत्र  तिष्ठामि  नारद  ।
संकीर्तन  और भजन  में  रस  आने पर तन्मयता  आती  है  और परम  तृपती
का  अनुभव  होने  लगता  है  ।   मैं  भगवान का  हूँ  भगवान् मेरे  हैं  यह  विश्वास  होने  पर  अंत:करण  का  दिव्य रस  जिव्हाके  जरिये  वाक्  इन्द्रिय
में  भर  जाता  है  और  लगता है  मानों  अ मृ त  की वर्षा  हो  रही  है   
रस  की फुहार  की  एक बानगी  देखो  ....
गौरांग  का  कीर्तन  श्रवण  कर ,  ताल  दे  दे  नाचें  मृग  सिंह  अजगर
निर्वैर  हो  नाम  सारे  ही   बोले  गोविन्द  दामोदर  माधवेती  ।

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