Sunday, 13 October 2013

ब्रह्माण्ड की खोज किसने की search of Universe


ब्रह्माण्ड  की  खोज  किसने  की  यह एक  बेहतरीन सवाल है  ।
एक नन्हा  शिशु  चिहुं  चिहुं करता  हुआ  दुनियां  देखता  है कि    यह सब  क्या  है ?इसलिए  ह्रर इन्सान ब्रह्मांड  की  खोज  करता है ।  इस
सम्बन्ध  मे दो   बातें हैं  पहली  यह  ब्रह्माण्ड कहांसे   आया । दुसरी  य्ह  कि इस  रहस्य  को किसने  जाना   ?
पहले प्रश्न  के उत्तर  मे  जो बात  कही  गयी  है  उसका  उत्तर  वैग्यानिको  के पास  भी  नही है केवल  कल्पना  ही कर  सकते  है  ।
वैज्ञानिक  जड़  स्थूल अथवा  पार्थिव  पदार्थों   का  ही  अध्य्यन  कर पाते  है । उन्हे वैद उपनिषद  तथा  दर्शन  के  आचार्यो के  विचारो   को
सुनना होगा  ।वैद कहता  है  कि  सन्सार  मेदो  प्रकार  की  सत्ताये हैं एक  जड़  दूसरी  चेतन  ।  चेतन  सत्ता  मे सबसे  बड़ी  चेतन  सत्ता ईश्वर  है  उससे  भिन्न  कुछ   संख्या  मे  जीव हैं  जो  पशू पखेरू कीड़े मकोड़े   के   रूप  मॆ   दिखाई देते  है । कूछ जीव मानव   के रूपमें
हैं  ये  ज्ञान रखते  है  ।  इन को  ईश्वर  ज्ञान देता  है  ।ईश्वर  के  अपने  कुछ  नियम  है वह कारण  प्रकृति  से   इस ब्रह्माण्ड  की  रचना  कर्ता  है।  ईश्वर स्वयम सैट  चित  आनन्द  स्वरुप  है वह  सृशटी  की  रचना स्त  रज  तम  गुणोसे करत़ा है ।बजे कारण  प्रकृति जड़   है और  सूक्षम  है ।  ईश्वर सर्वान्तर्यामी  है सर्व व्यापक है वह जीवात्मा  के  भीतर भी  विद्य्मान रहता है ।
          वेद और  दर्शनो  केअनुसार ईश्वर ने  सृष्टि   वा   ब्रह्माण्ड को जड़ - कारण  प्रकृति  के सूक्षम  कणों  से बनायाहै  सत रज तम  से  रचाया  है  । कारण प्र कृति  अपनी  सहज अवस्था में  सत  रज तम   साम्यावस्था में  होते  है  पर  जब  सृष्टि बनती  है  तब यह साम्यावस्था   भँग  होजाती है । और इसमें  विकार  आजाता है  । इस  प्रकार  जगत  अस्तित्व  मे  आया  ।
        अब  देखना  य्ह्ह  है  कि   ब्रह्माण्ड    की   रचना  के  बाद   इसकी  उत्पति के   रहस्य  को   किसने   जाना  कब   जाना  कैसे  जाना  ?             उत्तर  है  कि - सृष्टि  के  आरम्भ  मे  ईश्वर ने   बड़ी संख्या  में  स्त्री  पुरुषों  को जन्म  दिया   ।इन  आदि  मनुषयों में
चार व्यक्ति  अग्नि  वायु  आदित्य  व  अङ्गिरा   सबसे  योग्य पात्र  तथा  पवित्र  थे  इन्होने  निश्काम कर्म  व  योगाभ्यास कियाहुआ  था
ईश्वर  सर्वन्तर्यामी  व  सर्व व्यापक  होने  के  कारण   जीवात्माओ के  भीतर  भी  विद्य्मान  रहता  है  ।  तो  उसे जीवात्माओ  को  सन्देश 
देने के  लिए  किसी  बाह्य  साधन    वाक्  वाणी   आदि  इन्द्रियो  की  आवश्यकता   नहीं  होती  जीवात्माओ  के भीतर  ही  वह अपना  ज्ञान
स्थापित  कर  देता है  ।  सभी  मनुषयौं   को  भाषाज्ञान भी   ईश्वर  से प्राप्त  हुआ है   । यदि  यह  न  होता  तो  मनुषय  apnaa  jiivan  nirvaah  न  कर  पाते । इन्ही  चारॊ ऋषियौं  ने  ब्र्ह्मा  जी  को ज्ञान   दिया  ।ब्रह्माजी  ने  अन्य  मनु षयौं   से आपस में परस्पर  आदान
प्रदान  करके  इस  ज्ञान  को  आगे बढाया   । जनसंख्या  बढ्नेके  बाद  जब  लोगो  ने  जीविका  उपार्जनके  लिये  अपना  सम्पर्क दूरस्थ 
भागों  मे  जाकर  बनाना  आरम्भ  किया  तो  इनकी  भाषाओ  मे  बद्लाव  आने  शुरु  हो  गये  ।
आज  सारादेश  व  विश्व  के लोग  ब्र्ह्मानड   एवं  ईश्वर  के  बारे  मे  जान  गये  है ।

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