Monday, 28 October 2013

महामृत्युन्जय स्तोत्र के जनक की कथा

पद्म  पुराण  में  ऋषि  मार्कन्डेय  की  कथा है  ।  लिखा  है कि......
एक  ऋषि  थे उनकी  कोई संतान  न थी  ।उन्होंने सन्तान प्राप्ति  के  लिए  शिवजी  की  आराधना  की ।  उनकी  तपस्या से  प्रसन्न  होकर  शिवजी  प्रकट  हुए  और ऋषि  से  वर  मांगने  को  कहा ।ऋषि  ने  सन्तान  की  माँग की  ।  शिवजी  बोले  तुम्हारे  भाग्य  में सन्तान  सुख  नहीं  है  पर  तुम्हारी तपस्या  से प्रसन्न  हूँ ।
         प्रश्न  है  कि  तुम  कैसी  सन्तान  चाहते  हो ? लम्बी  उम्र  वाला  दुराचारी ,अथवा   कम  उम्र  वाला  श्रेष्ठ  आचरण  वाला  यशस्वी । 
ऋषि  ने छोटी उम्र  वाला  बालक  माँगा  ।शिवजी ने  कहा तथास्तु  ।यह  बालक  केवल  सोलह  वर्ष  तक  ही  जीवित रह  सकेगा  ,और  वे  अंतर्ध्यान  हो गए  ।
          वह बालक  चन्द्र  कला  की  तरह   बड़ा  होता गया   ।वह एक धार्मिक  बालक  था, वह  हर समय  शिवजी  का  ध्यान  करता  रहता  था   ।उसको  पता था की  उसकी  उम्र  सोलह  वर्ष तक  है   ।इसलिए वह  इस   महा  मन्त्र को ही  गाया करता  था  ।
सोलह वर्ष व्यतीत  होते ही  यम  दूत उसे  लेने  आगये  ।यम  दूत  उसे  ले जाने का  प्रयत्न करने  लगे  लेकिन वह  बालक  शिव  लिंग  से  चिपक  गया  यम  दूत  उसे  जबरदस्ती खींचने लगे परन्तु  उसने  शिवलिंग  को  कस कर  पकड़  लिया ।
शिवजी  अपने  भक्त को   संकट  मेंदेखकर  लिंग  में  से प्रकट  होगये और  उन
यमदूतों  को   अपने  त्रिशूल  से  मार  कर  भगा  दिया ।  शिवजी की  संरक्षण में रह कर  मार्कंडेय  ने  दीर्घ आयु  पाई  ।
जो  कोई इस  स्तोत्र  को  रोज  गायेगा  वह  भक्त  दीर्घ  आयुष्य  वाला  होगा साथ  ही  सांसारिक  प्रपंचों से  भी  छूटेगा  उस  भक्त  का  आवागमन  समाप्त  होगा ।

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