Saturday, 19 October 2013

अनमोल वस्तू का दुरुपयोग मत करो

वेद  में   संध्या  करने  का  नियम  अनिवार्य बताया है  ।
संध्या  में  सर्व प्रथम  अपनी  इन्द्रियों    का  स्पर्श  करते  हुए  प्रभु से उनके  बलबान होने  की  प्रार्थना  करते  हैं  ।।।। ओम  वाक् वाक्  ,ओम  प्राण  प्राण 
ओम  चक्षु  चक्षु   , ओम  श्रोत्रम  श्रोत्रम  आदि  ।
    सर्व  प्रथम  वाक्  वाक्  वाणी  में  पवित्रता  और  बल  माँगा  गया  है  ।
वस्तुत;  मनुष्य  की  पहिचान  वाणी से  ही  होती है ।इस  वाणी  जिव्हा  के  दो काम हैं  खाना  और  बोलना  ।  इन्ही  दो  बातों  से व्यक्ति  के  अच्छे  और  बुरे  मनुष्य का  पता चल  जाता  है  ।
बोलत  ही  पहिचानिये  शाह  चोर  की  जात
अन्तर  की  करनी   सभी  निकसे  मुख  की  बात। ।
बर्तालाप  से  ही  पता  चल  जाता है  की  व्यक्ति  क्या खाता है ।  यदि  वह  सात्विक  भोजन  दाल  रोटी सब्जी  खाता  है  तो  सज्जन  होगा  ।यदि  कोई  मिर्च मसालेदार  भोजन  करता है  तो  वह  भोगी  होगा  ।  यदि किसी  का  भोजन  मांस  मछली  अण्डा  है  तो वह  विकृति  मष्तिष्क  वाला  मनुष्य  है  ।  सज्जन  व्यक्ति  की  वाणी  शीतल  होती  है  ।कटु वचन  बोलने  से  व्यक्ति  को  अपयश  प्राप्त  होता है  । कबीर दास  कहते  है  ऐसी  वाणी  बोलिए  मन  का  आपा  खोय ,  औरन  को  शीतल  करे  आपहु शीतल  होय   ।
सच  में  मीठी  और प्यारी  वाणी सब  नर  नारी  पसन्द  करते  हैं  ।भरतृहरि ने  नीतिशतक  में  वाणी को  भूषणों का  भूषण  कहा  है    
न तो    बाजूबन्द न चन्द्र  के  सामान  उज्ज्वल  हार   मनुष्य  की  शोभा  बढ़ाते है  न  उबटन   न  स्नान  न  पुष्पमाला  न  अच्छी  तरह  सवाँरे  बाल मनुष्य  को  भूशित करते  हैं   ।  वाणी  ही है  जो  व्यक्ति    को  अलंकृत  करती है  अत:शुद्ध 
संस्कारित  वाणी  धारण  करो  ।   संसार  में  जितने  भी  झगड़े  हो  रहे  है  वे  सब  वाणी  के  ही  खेल  हैं इतिहास बताता है  कि लक्ष्मण  के प्रति  सीता  के  कटु  वचनो  ने  सीता  का  अपहरण   तथा   श्री  रामचन्द्रजी  को  संकटों  में  डाला  ।  पांडवों  के  निमन्त्रण  पर  आये  दुर्योधन  को  द्रोपदी  के  वचन  अन्धों की  अन्धी  सन्तान   वाले  शब्दों  ने  जो  परिणाम  दिखाया   उसके  पश्चात  भारत आज  तक  नहीं  संभल  सका  है।  इस  वाणी  ने  बनाबनाया  काम  बिगाड़े  हैं  । घडी  भर  चुप  रहकर  समझने   और  विचारने  की  क्षमता  होनी  चाहिये
तोल तोल कर  टेलीग्राफिक भाषा  में  बात  करनी  चाहिए  ।  कुछ  शब्द  न  बोले
तो  नुकसान  नहीं  होता  इससे  संघर्ष  घटता  है   कोई  प्रतिकिर्या  नहीं  होती  ।
अपने  को  दुसरे से  ज्यादा अच्छा  और  ऊँचा  सिद्ध  करने  की  क्या  जरूरत है   ।  आपको  पता होना  चाहिए  की  हमारी  वाणी  से  निकला  एके एक  शब्द हमारी  शक्ति  को  बाहर  निकालता  रहता है ।चुप  रहने  से  हमारे  अन्दर  शक्ति  का  संचय  होता है  । हम  कोई  खिलोना  तो  नहीं  हैं  जो  अपनी  चाबी दुसरे को सोंप दें   ।इसलिए यदि हम शान्त रहते हैं  तो  हमारा स्वाभिमान   बना रहता है।

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