Tuesday, 8 October 2013

हमारी बुद्धि पवित्र हो

जिस  दर पर    शिर  झुकता  नहीं  वह दर नहीं होता ।
हर दर   पै  जो  झुक  जाय   वो शिर  नहीं  होता ।
          हमारे  वेदों   के  संध्या  मन्त्रों में  मार्जन  मन्त्र  आता है   मार्जन  का  अर्थ  है  --माँजना  शुद्ध   करना  ।
साधक  अपने  शिर  पर  जल  लगाता  हुआ  माँग  कर  रहा है कि  हे !  प्रभो  मेरे  शिर  को  यश  से  भर  दे   ।  क्योंकि  शिर  में  बुद्धि  का  स्थान  है ।  जिसकी  बुद्धि  ठीक  है  उसका  सब  कुछ  ठीक  है  ।(बुद्धियस्य  बलम  तस्य ) बुद्धि  ज्ञान  से बढ ती है   और  ज्ञान से  ही  शुद्ध  होती  है  ।अत:  प्रत्येक  व्यक्ति  को  स्व   निरीक्षण  करते  रहना  चाहिए  कि  कहीं  हमारी    बद्धि  कुबुद्धि तो  नहीं  होगयी  ।  क्योंकि बुद्धिहीन  शिर  दूसरों  के  आधीन  रहते  है ।
           यूँ तो  मार्जन  मन्त्र  शरीर  की  सभी   कर्मेन्दिर्यों  का   मार्जन  करने  का  उपदेश  देता  है   तथापि  शिर  को  सर्व प्रथम  पवित्र  करने  को  कहा  है ।
    भक्त  कहता है   "ओम भू :पुनातु  शिरसि  "  अर्थात  हे  प्रभो ! तू  भू :है प्राण  है सारे  विश्व  के  कण  कण  में  व्याप्त  है ।  इसी प्रकार  शिर  से  सारे  शरीर  में  ज्ञान  रश्मियाँ  फैली  हुई  हैं  ।  इस  शरीर  रूपी  विश्व  का शीर्ष  स्थान  मस्तिष्क है  मस्तिष्क  की  शुद्धता पर ही  सारे  अंग निर्भर हैं ।  अत: हे  प्रभो  !
आपसे  यही प्रार्थना है कि मेरे शिर  को पवित्र करो  ।  जिससे  मेरा  भाल  सदैव  ऊँचा रहे  । हमेशा सद विचार  उत्पन्न हों ,  क्योंकि  सद्विचारों से ही आचार  और  व्यवहार  में  शुद्धता  आती  है । दुसरे  शब्दों  में मस्तिष्क को बुद्धि कहते हैं ।
गायत्री   मन्त्र  और अन्य कई  मंत्रो में  बुद्धि की ही  माँग की  गयी  है ।
" धियो यों न:प्रचोदयात  ।यानि  हमारी  बुद्धि  को  सन्मार्ग  की  ओर ले  चलो ।
      मनुष्य  जो  भी  सोचे  ठीक  सोचे । जो सहानुभूति  दिखाए वह  सही हो यही शिर  की पवित्रता  है ।  जो  वस्तु  जैसी है  वैसी  ही  जानना,यही  वस्तु  का  यथार्थ  ज्ञान  है   ।  जैसी  परस्थिति  है उसी  तरह की  चाहना  करना   बुद्धि मानी  कही जाएगी  ।  अन्त में .......
    ओम  यां  मेधां  देव गणा:   पितरश्चो पासते
तया मा मद्य मेधयाsगने मेधाविनम कुरु  स्वाहा   ।

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