Saturday, 21 September 2013

Why the Crocodile laughed मगर क्यों हँसा

एक  पंडित  जी  किसी  गृहस्थ के  यहाँ  रोजाना  गीता  सुनाने  जाया करते  थे   रास्ते में  एक  नदी  पड्ती  थी  । उस नदी में एक मगर  पंडित जी को रोज  जाते  आते   देखता था ।एक दिन  उसने पंडित जी से  पूछ ही लिया  कि वह रोजाना  पोथी  बगल में दबाये कहाँ  जाता है ।पंडित जी ने  बताया कि वह  किसी  ग्रहस्थ  को  गीता  सुनाने  जाता है और  दक्षिणा में  दो  सोने  की  मुहरें प्राप्त  करता है ।

  मगर  बोला  पंडित जी  मेरी भी  बड़ी  इच्छा है कि  मैं  भी  गीता  सुनूँ   ।यदि  आप  मुझे  गीता  सुनायेंगे   तो मैं आपको  पाँच मुहरें रोज दूँगा  ।


पंडित जी पहले तो डरे  ,लेकिन  पांच  मुहरों  की  बात  सुनकर  राजी  हो  गए  ।


लेकिन  शर्त थी कि गीता  पहले  मगर  सुनेगा  ।अब पंडित जी  गीता पाठ पहले मगर को सुनाते   ,पश्चात  ग्रहस्थ  को  सुनाते  ।धीरे  धीरे  ग्रहस्थ   को   गीता  सुनाना बंद  हो  गया  ।


एक दिन  मगर  पंडित  जी  से  बोला  पंडित जी  इस  नदी  में  रहते  रहते मैं  तंग हो  गयाः हूँ   ।यदि  आप मुझे  इस  नदी  से  बहर  निकाल  देंगे तो  मैं  आपको  मुहरों से भरे पाँच घड़े दूँगा  ।पाँच  घड़े   मुहरों से भरे सुनकर  पंडित जी  उसे  निकालने को   तैयार  हो गए ।  बड़ी मेहनत  और  बड़ी  मुश्किलों के  बाद  वे उस  मगर  को  निकाल पाए ।शर्त के  मुताविक  मगर  ने  पाँच घड़े मुहरों  भरे दे दिए  ।जैसे ही पंडित जी ने  घड़े  स्वीकार किये  मगर  खूब  जोरों से   हँसा।मगर को हँसता  देख कर  पंडित  जी  ने  इसका  कारण  पूछा  ।

तब मगर बोला इसका राज  अवन्तिका में रहने वाला  गधा बताएगा  ।

 अब  पंडित  जी  को  इसका  राज  जानने की  उत्सुकता  होने  लगी   ।  वे   अवंतिका  नगरी  पहुंचे  और  खोज बीन  करके  उस धोबी  का  पता  लगाया जिसके  पास वह  गधा था ।  उन्होंने उस गधे से  पूंछा  की  क्या वह मगर की हँसी का  राज  जानता है  ?  गधे ने  उन्हें बताया  हाँ  ।   और फिर कहा कि....
           

  मैं  पिछले  जन्म में  एक  राजा का मंत्री था  ।राजा राज्य कार्य  से  थक  गया  था  । अत:उसने  मन बहलाने  के लिए  किसी  पर्वतीय  स्थान पर  जाने  का  प्रोग्राम  बनाया ।राजा  का  मैं  कृपा पात्र  था मुझे  भी  साथ ले  गए 

पर्वत की   वादियों   की  सुरम्यता   इतनी  मनमोहक  थी  कि  राजा का मन  वापिस  जाने  को तैयार  नहीं  हुआ   ।इसलिए  राजा  ने मुझसे  कहा  कि  मन्त्री  जी  हमतो  अब  यहीं  रहेंगे  अगर  तुम चाहो  तो  तुम  भी  हमारे  साथ  रह जाओ  ।  अथवा  ये  सौ  स्वर्ण  मुद्राएँ लो  ,और अपनी  जिन्दगी  के  बचे  हुए    दिन   मौज  से  विताना  । मैंने  वह  स्वर्गीय  अवसर  छोड़कर  सौ  मुद्राएँ  लेना  स्वीकार किया  । उस समय मेरी  आयु  पचहत्तर  वर्ष  की  थी  ।  थोड़े दिन  वीते थे कि मुझे  मौत पकड़ कर ले गई  और कर्म वश मुझे  यह  योनि  मिली कहने का तात्पर्य यह है कि धन से किसी का  उद्धार नहीं  होता  अपितु  दुःख   के   सागर में डुबो देता है  पंडित  जी  आपने  उस ग्रहस्थ को गीताज्ञान  दिया  और  स्वयम कोरे ही रहे  


आप जैसे लोगों  के लिए  ही कहा  जाता है 
       पर  उपदेश  कुशल बहुतेरे  ,जे आचरहिं ते  नर न  घनेरे  ।

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