Sunday, 8 September 2013

खोपड़ी SKULL

एक   संत  अपने मित्र के साथ सैर  कर  रहे थे  ।  घूमते  घूमते  वे एक  श्मशान
की  ओर  निकल  गए  ।  चलते  चलते  संत  जी  का  पैर  किसी  चीज  से  टकरा गया  ।  झुक  कर  देखा  तो   वह एक खोपड़ी  थी  ।संत जी   ने  उस खोपड़ी को  उठा  लिया  और  बार बार  उससे  क्षमा  मांगने लगे   कि अनजाने में मुझसे  गलती   हो गयी  मुझे  माफ़ कर दो  ।
बार बार माफ़ी मांगते  देख कर  साथ  वाला मित्र बोला  ...अरे यह क्या पागलपन
कर रहे हो  । यह कोई जीवित व्यक्ति  है जो इतनी  माफ़ी  मांग रहे हो  ।
      संत  बोले  पता है  यह  श्मशान  घाट  बड़े बड़े  आदमियों  का है    छोटे  गरीब मृतकों  का  अलग है  ।इस दुनियां में श्मशान भी   छोटे  बड़े आदमियों के
होते हैं  ।  यह  खोपड़ी  भी  किसी  रईस  व्यक्ति की है  ।  ईद खोपड़ी  के   आधीन  न  मालुम  कितने  नौकर  चाकर  मुनीम  बड़े  बड़े  अधिकारी रहे होंगे  ।
न  मालूम  कितने  लोगों को  अपनी  वक्र   निगाहों से नीचे  गिराया  होगा  ।
अपना  काम  बनाने  के  लिए  रिश्वत  देकर  न मालुम कितनों का अध्:पतन किया
होगा  । जीवन में संपदा  पाकर कितना गर्बीला  रहा होगा ।
        न  मालूम  कितनी  अकड  रही  होगी  इसके जीवन में   ।   और  आज  वही  गर्वोन्मत्त  सिर भू  लुंठित  हो  रहा है  ।यदि यह व्यक्ति  आज  जीवित  होता तो  मेरी  ठोकर  मुसीबत खड़ी  कर देती  ।
और संत उस खोपड़ी को अपने  साथ  ले गया  ।वह रोज सुबह   सुबह उससे
  माफ़ी मांगता  ।अपने  मित्र को  समझाते हुए कहता   कि  बड़े छोटे  आदमियों
की खोपड़ी में कोई फर्क नहीं होता ।यह तो  लोगों का दू:स्वप्न हैकि   वह अमीर
है  यह  गरीब है   ।मिटटी सबको   मिटा  देती  है  ।  सबको  एकं  न  एक  दिन  खाक  में  मिल जाना है  ।
मैं  इसे  अपने पास इसलिए  रखता हूँ ताकि  मुझे  याद  रहे कि मेरी  भी  खोपड़ी आज या  कल  में  मरघट  में पड़ी  लोट   रही  होगी  । और  चलते  फिरते  लोगों  की ठोकरें  लग रही होगी ।  फिर    मैं  भी  कुछ  न  कर  सकूंगा   । 
   मानव  !मत कर  तू  अभिमान  रे  बंदे मत कर तू  अभिमान
             झूठी  तेरी  शान रे बंदे  झूठी  तेरी  शान  ।

2 comments: