Thursday, 5 September 2013

prbhu ko pranamप्रणाम

जिसके   प्राण   अपान    तुल्य  हैं   ,  इस  जगती  का मंद  पवन    ।
विमल   द्रष्टि   सम   फ़ैल  रही  है  , नक्षत्रों  की  ज्योति  किरण   ।
इस  जग के  व्यवहार  हेतु    ही  , स्पष्ट  किया    जिसने  दिक् ज्ञान  ।
उस  महान   परमेश्वर को  है ,  अर्पित  मेरा  नम्र  प्रणाम    ।
   
सुख  के  माथे  सिल परे जो प्रभु  से हमें  हटाये    बलिहारी  वा  गुरु  की  जो  पल पल  नाम  रटाये ।  गुरूजी  ने  बताया   कि
सुख  के  साथ  में  दुःख  चला  आये  ,  दुःख  के  मुखोटे में  सुख  चला आये   ।लौटा  न  देना  यारो  !   मेहमान ये   चार  दिन  ,तेरे   मेरे सुख  दुःख  की  दास्ताँ  ये   चार  दिन  ।
जो  जिसके  हक  में  देखा बेहतर  बना दिया  ,  मुझको  गरीब  तुझको  तबं गर बना  दिया   ।नादाँ  मकामे--- रश्क  नहीं जाये  शुक्र  है   ।
सौ  से  बुरा तो  एक से  बेहतर  बना  दिया  ।

ज्ञान  बढे   गुण बान  की  संगत, ध्यान  बढे   तपसी  संग  कीन्हें   ।
मोह बढे   परिवार  की  संगत  , लोभ  बढे   धन  में चित  दीन्हे    ।
क्रोध  बढे  नर   मूढँ   की  संगत  ,  काम  बढे  तिय  के  संग  किन्हें  ।
शुद्ध  विवेक  विचार  बढे   ,कवि  दीन सुस्ज्जन संगत  किन्हें   ।

तात मिलें  पु न:  मातु  मिलें सूत भ्रात  मिलें जुवती सुखदाई   ।
राज मिलें  गज  बाज  मिलें  सब  साज  मिलें  मन बांछित  फल पाई
लोक मोले सुर  लोक मिले  विधि  लोक मिलें  बैकुंठ हु जाई
सुन्दर  और मिलें सब  ही  सुख  , संत  समागम  दुर्लभ  भाई      ।

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