Monday, 23 September 2013

जीवन एक सम्पदा - Life is Valuable

भोर  का समय था  कुछ  कुछ  अभी  अन्धेरा भी  था  । चिड़ियों  के चहचहाने  का  स्वर  तरंगित  हो रहा था , यदा कदा  कोई  कौआ भी  काँव काँब करके उड़ रहा था । ऐसे  झुटपुटे में एक  माँझी  अपना  जाल लेकर  नदी  किनारे  जा रहा  था  ।रास्ते  में कुछ  पैरों  से  टकराया  झन्न  की  आवाज  हुयी ।  झुक कर  देखा एक  थैला  था  । खोल  कर देखा  उसमें  काँच  के   टुकड़े भरे  पड़े  थे   ।क्या करूँ  इनका  ?  फेंकने लगा  एक  एक  कर  के  सारे  काँच  । केवल  एक बचा  उसको भी  फेंकने  जारहा था  कि सूर्य देव  उदित  होगये  ।सूर्य की  रश्मि 
पड़ते ही  हाथ का  काँच  चमकने  लगा ।अरे  !मैंने ये क्या किया  ।हाय  यह तो  हीरा  थे  । सिर  पकड़कर  बैठ  गया  और  लगा  पछताने  । हाय  क्या करूं  ? अपने ही  हाथों  आग  लगाईं  हाय मैंने  यह  क्या  किया ।मेरा  सारा जीवन ऐश आराम से  गुजर  जाता  पर अब  पछताए  क्या  होत है जब  चिड़ियाँ  चुग   गयी खेत  ।         

कहानी  symbolic  है   । जीवन  के  सम्बन्ध में हम  भी  ऐसा ही  व्यवहार  कर  रहे हैं  जीवन एक बड़ी  सम्पदा है  ।लेकिन  आदमी  सिवाय उसे  फैंकने के  और  गवाँने के और कुछ  नहीं करता  ।जीवन क्या है  यह  भी  पता नहीं  चल  पाता  ।जीवन  में  कौन  सा  राज   कौन सा  रहस्य  कौनसा  स्वर्ग कौनसा  आनन्द  कौनसी  मुक्ति  क्या  छिपा था  उन  सबका  कोई  भी  अनुभव  नहीं  हो  पाता  और  जीवन  हमारे  हाथ से  रिक्त  हो जाता  है  ।

 यद्यपि  हमारी  जिन्दगी  हमें  छोड़कर  चली  जाएगी  तथापि  हमारी जो असली  जिन्दगी है  वह  शाश्वत है  वह  कभी  नहीं  छूटेगी   ।कहानी हमें  इंगित   कर रही है कि  हम  जो  भी  करते  हैं  उसीसे  निर्मित  होते  हैं  ।  हमारा   कृत्य ही   धीरे   धीरे   हमारे  प्राण और  हमारी  आत्मा का  निर्माता   हो  जाता  है  । जीवन  के  अतिरिक्त  न कोई  परमात्मा है  और  न  हो  सकता  है ।जीवन  को  साध  लेना ही  धर्म  की साधना है  ।और जीवन में  ही  परम  सत्य  को  अनुभव  कर  लेना  मोक्ष  को  उपलब्ध  कर  लेने  की  पहली  सीढी  है 


अगर  जीवन  अंधकारपूर्ण  मालुम  पड़ता  है  तो   वह  जीने  का  गलत  ढँग है  यही  जीवन  आनन्द  की  वर्षा भी  कर  सकता है  ।

ओम  हूँ  आनन्द हूँ  ब्रह्म  सच्चिदानन्द हूँ  ।ॐ  हूँ  आनन्द हूँ  प्रेम  स्वरूप   ज्योतिरूप  हूँ  ।

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