Friday, 27 September 2013

इन्द्र तथा विरोचन

अधिकतर  परिवारों  में  दो  तरह  की  सन्तान  पाई  जाती  हैं  ।एक   संस्कारी
एक   स्वेच्छाचारी ।    आध्यात्मिक जगत के  दो  पात्रों द्वारा  इसको अभिनीत  कराने  का   प्रयास कर  रही  हूँ   ।
प्रजापति  की    दो  सन्तान हैं ,इंद्र   और   विरोचन  ।
इंद्र  देवो का  प्रतिनिध है   विरोचन  असुरों का   प्रतिनिध  है ।एक   बार  प्रजापति
ने  पास  आये  सत्संगियों  को  आत्म  तत्व   के  बारे में  बताया  कि  यह  आत्मा  अजर   अमर  शोक  रहित ,पाप रहित  , क्षुधा   पिपासा रहित,   सत्यसंकल्प  और  सत्यकाम   है  ।
इसको  ही खोजने  का  प्रयास करो  ।  जो  कोई  इसको   जान  लेता  है उसकी  सारी  कामनाएं  पूर्ण  हो  जाती  हैं  वह  सारे  लोकों  को  प्राप्त  कर  लेता  है  ।
         दोनों  प्रतिनिधियों  ने  सुना  और  अपने  -  अपने  समूहों  में बैठकर  कहने  लगे ।"  क्यों न  हमभी  उस  आत्मा को  जानें  जिससे  सब लोकों  और  कामनाओं  की   प्राप्ति  होती  है  "। 
अत;  दोनों  प्रजापति के पास  पहुंचे  ।  नियमानुसार  उनको  बत्तीस  वर्ष  तक  ब्रह्मचर्यपूर्वक  रहना  पड़ा ।  तपस्या  काल  पूरा  हुआ  तो  प्रजापति  ने  उनसे  आने  का  कारण  पूंछा  ।
उत्तर में  दोनों  ने  कहा की हमने  आपका उपदेश  सुना था ,हम  उसी  आत्म  तत्व  को  जानने  की  इच्छा  लेकत आपके  समीप  आये  हैं ।
प्रजापति  ने  कहा "  देखो  ,जो  आँख से  दिखाई देता है   वही   अमर अभय और  महान  ब्रह्म  है  ।         इस पर  इन्द्र  और विरोचन  ने   पूँछा  "महाराज,
यदि हम अपना  प्रतिबिम्ब  जल  में  या  दर्पण  में  देखें  तो  क्या  उसी   को आत्मा  मानलें ।   आचार्य बोले  ..पहले तुम  जल में देख कर  ब्रह्म के स्वरूप का अनुमान करो  फिर बताना मैं आगे  तुम्हारा समाधान करूंगा ।
दोनों  ने  अपनी  परछाई देखी । कहा  नख  से शिख  तक शरीर  दिखाई  दे रहा है   ।।।।।  ठीक है  अब  तुम   वस्त्र  आभूषण   धारण  करके  देखो "  ।   दोनों
वस्त्र  आभूषणों  से  सुसज्जित  हो गए   " बस यही  समझो  कि सुसज्जित  शरीर  यही  तुम्हारी  आत्मा है  । दोनों  शांत  मन  से चले गए  ।
प्रजापति तो दोनों  की  पात्रता की  परीक्षा  लेना चाहते  थे  ।
विरोचन  ने  कुछ नहीं  पूछा ।शरीर को ही  सब कुछ  मान लेने की बात अपने  साथियों  को  बताई  । कहा   सचमूच  शरीर  ही  पूज्य नीय है ।इसी को
सुन्दर  स्वस्थ  बलवान बनाओ तभी  त्म्हेंलोक  परलोक  कसुख  मिलेगा  ।
यहीं  से  असुर  सभ्यता  का  आरम्भ  हुआ ।
परन्तु इन्द्र  बुद्धिमान  था  ,शरीर को अलंकृत करने की  बात उसके  गले नहीं उतरी  । सोचा   आत्मा  तो  अजर अमर है  शरीर  के  नष्ट  होने  का  उसे  नष्ट  नहीं माना जाएगा  तो क्या  किसी  के  अंधे  होने  पर  आत्मा कोभी  अँधा माना 
जाएगा ।  
असन्तुष्ट  इन्द्र फिर  पहुंचा  प्रजापति  के  पास  ।  "बात  तो  ठीक  है  मैं  तुम्हें
पुन:ज्ञान  दूँगा  "  प्रजापति ने  कहा ।  "  देखो  स्वप्न  में जो  विभिन्न   प्रकार
के  अनुभव  करता  है वही  आत्मा  महान है   अमृत  है अभय है  ।यह  शरीर पञ्च  भूतों से  निर्मित  मरण  धर्मा  है  तथापि  यह  शरीर  ही  इस  अमर  आत्मा  का निवास  स्थान है ।  जब  तक  आत्मा  शरीर  में  रहती है  तभी  तक  वह  द्वन्द्वों  से  घिरी  रहती है   शरीर  से  पृथक होते  ही वह  द्वन्द्वातीत हो जाती है ।  जैसे  कोई  घोडा रथ से  खुलते  ही  आजाद  हो  जता है 

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