Thursday, 26 September 2013

नचिकेता

कठोपनिषद    का  नायक  एक  सुसंस्कारी  कुमार  नचिकेता  है ।  जिसके  निर्मल  पवित्र  चित्त ने  संसार  को  दुःखों का  घर  माना  और  विषय  -  भोगों  को बंधन  का मूल  कारण  समझा   ।  इस कहानी  में  वह  इन  दौनों  से  मुक्ति  पाने  का प्रयास  कररहा है  ।  
नचिकेता  का  अर्थ  है  ..   "  न च  "का  अर्थ है    नहीं  भाई  नहीं  ।
"केता  "   जिज्ञासु का  प्रतीक  है  जो  पाखंड  को  देख  कर  विचलित हो  जाये  कि यह  काम  ठीक  नहीं  ।
ऋषि   बाजश्रवा का  पुत्र  उद्दालकं  ने   विश्वजित  यग्य  किया ।यग्य के बाद  दक्षिणा  में  उद्दालक ने  सारा धन   बूढई   और  दूध न  देने  वाली    गौऐ   भी  दी  ।  पुत्र नचिकेता  ने इस  दान  का  प्रतिरोध  किया ।कहा  मुझे किसे दोगे   पिता  कुछ न  बोले  ।  नचिकेता  ने  तीन बार  अपना  प्रश्न  दुहराया  ।क्रुद्ध होकर पिता  ने कहा    तुझे  यमराज  को  देता  हूँ  " 
पिता का  वचन  शिरोधार्य नचिकेता   यम-आचार्य के  यहाँ पहुँचा   ।आचार्यजी  निवास  पर  नहीं  मिले   ।  तीन दिन  व्यतीत  होने पर  चौथे दिन  वापिस आये  देखा  एक  ब्रह्मचारी  तीन  दिन से भूखा  प्यासा  रहकर  उनकी  प्रतीक्षा  कर  रहा है ।  पहले आचार्यजी  ने  उसको प्रणाम किया और कष्ट  उठाने  के  लिए  क्षमा  माँगी  । फिर कहा तुम  मेरे  द्वार पर तीन दिन  भूखे रहे  मैं तुम्हें  तिन  वर  देता हूँ  । 
नचिकेता ने  पहले वर के  माध्यम से  पिता  का  रोष  भाव  दूर हो  वे  मुझेपूर्ववत स्नेह्से स्वीकार  करें  -वर  माँगा  ।    तथास्तु   । आचार्य ने कहा ।
दुसरे वर से अग्नि   विद्या की  जानकारी  माँगी  ।  आचार्य  ने  बताया  कि ब्रह्म  अग्नि  सर्व  श्रेष्ठ  अग्नि है  यह कोई  भौतिक  अग्नि  नहीं  है  अपितु जब व्यक्ति
जीवन   की  तीन   सन्धियों  से  गुजरता है  वह  ब्रह्म  अग्नि  है  जैसे  ब्रह्मचर्य  से  ग्रहस्थ  ,  ग्रहस्थ से    वानप्रस्थ  मे   प्रवेश  ,और  वानप्रस्थ  से  सन्यास  में  प्रवेश  करना  होता है   ।  इस  प्रकार  व्यक्ति  को  समाज के  लिए  यज्ञमय  जीवन  व्यतीत  करना  होता  है।
तीसरे वर  में  नचिकेता नेकहा    मृत्यु  के  बाद  क्या  होता है  ?
आचार्य ने कहय्ह  सूक्ष्म  रहस्य  है  यह तेरी  समझ  में  नहीं  आएगा  ।तू मुझसे संसार के  दुर्लभ  भोग  माँग ले ।   उसके बाद आचार्य ने  सांसारिक  प्रलोभनों  का  ढेर  लगा दिया  --- शतायु  पुत्र  पौत्र, यथेच्छ   हस्ति  अश्व  गौ   ,सोनाचांदी  
भूमि   ले  ले  । यह   तेरे  यथेच्छ  वर्षों  तक  काम  आयेंगे ।
परन्तु  भोगों  से   विरक्त  नचिकेता   ने  कहा  ये  सब  नश्वर  पदार्थ  हैं  आज  हैं  कल  नहीं रहेंगे  । सांसारिक  भोग  इन्द्रियों  का  तेज  हर  लेते  हैं  ।
सवारी के  हाथी  घोड़े  अपने  पास रख  ।धन को  देख  लिया   धन  से  कोई  व्यक्ति  तृप्त  नहीं होता  एक व्यक्ति को यदि  संसार की सारी  दौलत  मिल  जाए 
तो भी  अतृप्त रहेगा  । मुझे  तो मृत्यु  का रहस्य ही  जानना ह  ।
इस उत्कृष्ट वैराग्य  को  देख  कर  यम  जैसे  आचार्य  को  मानना  पड़ा  ,  कहा तू  स्वर्ण  जंजीर में  नहीं  फसा जिसमें  बहुत  से लोग  फँस  जाते  हैं  ।
वस्तुत:आत्म  ज्ञान  दुर्लभ  वस्तु  है ।
बहुतों  को  तो यह   सुनने को भी  नहीं  मिलता  ।जो  सुन  पाते  हैं वे समझ नहीं  पाते   ।कोई  विरला  ही  इसका उपदेशक  होता है और  उसको  ग्रहण  करने  वाला  तो  आश्चर्य जनक होता है  ।
नचिकेता  तू  धेर्य वान है ।जोमैने  उपदेश  दिया है  उसे  तर्क  बद्धि  से  हटा मत  देना  । हे प्रिय !यह  अछि  तरह  जान  लेने  योग्य  है  ।
सारे  वेद जिसका  गान  करते  हैं  जिसको जानने  के लिए  ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है  वह  पद ओम है  यह  अविनाशी   तत्व है  । यही  ब्रह्म  है ।
इस भोतिक  शरीर में  यही अशरीरी  आत्मा  निवास  करती  है ।यह  न  उत्पन्न  होती  है  न  मरती   है ।  यह  शाश्वत  है    शरीर के  मरने पर  भी यह  नहीं
मरती  ।यह  आत्मा  अणु  से भी छोटी  होती है  । ओम  द्वारा इसका  भक्त  लोग  स्मरण करते  हैं  ।
तुमने पूछा  कि  मृत्यु  के  बाद  क्या  होता है ? 
मृत्यु शरीर की होती है  आत्मा की नहीं  ।आत्मा  को जानने की  पहिचान   है  ।..जिसके    बिना  आँख  देख  नहीं  सकती  , कान  सुन नहीं  सकते ।शरीर की  सारी  क्रिया  समाप्त  हो  जाती  है   ।  आत्मा  अजर  अमर है   मृत्यु  के  बाद  यही  शेष रह  जाती है  ।  जो  धीर  मनुष्य हैं वे  मानव शरीर  के  वियोग  होने  पर  दुखी नहीं होते  ।

No comments:

Post a Comment