Sunday, 15 September 2013

लोग लकीर के फकीर

एक  प्रसिद्ध  झेंन  गुरु   नेपाल  के  बोद्ध   मन्दिर  में ठहरा  ।  रात  सर्द थी  ।
उसने  देखा  कि मन्दिर  में  बहुत  सी  मूर्तियाँ  हैं  जो  लकड़ी की  बनी  हुयी  हैं
वे   सब   भगवान्  बुद्ध  की  मूर्तियाँ  थीं   ।उसने  एक  एक  करके  कई  मूर्तियाँ  उठाई  और  जलाकर  तापने  लगा  ।  मन्दिर  में  आग  लगी  देखी  तो  पुजारी  उठकर   आया  और  बोला  अरे  !   यह क्या  अनर्थ  कर  रहे  हो  ,  भगवान्  
बुद्ध   की  मूर्तियां  जला दी  ।
            उसकी  बात  सुनकर  झेन  गुरु  जली  हुई  राख  में  लकड़ी  घुमाने लगा  जैसे  कुछ तलाश  कर  रहा  हो  ।   पुजारी  ने  पूछा  अब  क्या  खोज  रहे  हो  ?  गुरु  बोला  बुद्ध  की अस्थियाँ  खोज  रहा  हूँ  ।
          असल में तो हम   पंडितों  और  महात्माओं  की  बातें  सुन  सुन  कर 
इतने  भ्रमित   हो  गए  हैं  कि सत्य  को  तो  भूल  ही  चुके हैं  ।  आक्रति  से  इतने  जुड़  गए  हैं कि  आक्रति  के  पीछे  की  आत्मा  दिखाई  ही  नहीं  देती  ।आत्मासे  ही  प्यार  किया  जाता  है  ।
    हमारी  यह  भ्रान्ति  इतनी  सघन  और   सदियों  पुरानी  है  कि जब  कोई  भगवान्  की  मूर्ति  बना कर  रख  देता  है  तो  हम  उसके  सामने  झुकने  लगते  हैं   ।  हमें  अपनी  मूढता  का  बोध भी  नहीं  होता  कि  हम  लोगों  की  देखा  देखी  अपना  कितना  अनर्थ  कर  रहे  हें  ।
    तो  सबसे  पहली  चुनौती  यह  होगी  की हम  अपनी   भूल  को  समझें और  सुधारें  कि  अब तक जो  किया  है गलत था  ।हमें  इस भेड़  चाल से  छटकारा  पाना होगा  । और  जीवन  के  सत्य  को  स्वीकार  करना होगा  ।
      असली बात यह है कि अंतर का  जगत   भी  सत्य  है और  बाहर का जगत भी  सत्य है । यह  संसार  परमात्मा की  काया है  और  इसमें  छिपी  हुई जो  चेतना है वह परमात्मा  की  आत्मा है ।
    सत्य को चाहते हो तो  चित्त को किसी से मत   बाँधो  ।जहाँ  मत  है  वहाँ  सत्य  नही  आता ।
  बोध से बुद्धि  के  पार  जो  हो  गया   , कर्म करता हुआ  मुक्त  वह  हो गया 
दृष्टि   निर्मल हुई  रहता निश्चेष्ट  है  ,वासना मुक्त योगी वही  मुक्त  है  ।

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