Friday, 30 August 2013

WHERE ARE PEACE AND PLEASURE

आनन्द  स्रोत   बह  रहा  फिर भी उदास है , अचरज है जल में रह कर भी मछली को  प्यास है  । 

ऐसा क्यों  है ? परम  ज्ञानियों  का अनुभव  है कि सुख  न तो खाने पीने में है न सोने जागने में है ।न  मांस मदिरा मैथुन सेवन में और न ही भोग विलास  में है । तो भला  सुख  शान्ति  आनन्द  कहाँ से   मिले। 

असल में देह के द्वारा  परमानन्द  की  प्राप्ति  तो  होती  नहीं  ।अज्ञानी  जीव परमानन्द की  खोज  में विपरीत पथ पर  चल पड़ता है  ।और दुखों के दलदल में फंस  जाता है । जिस  तत्व से यह देह बना है  मन  इन्द्रियां  और प्राण , उसका नाम  प्रकृति  है , इसका  स्वाभाव ही  मोह   अज्ञान उत्पन्न  करना  है  अत:
परमानन्द की  चाहना करने वाला    अल्पज्ञ  जीव कामनाओं   तृष्णाओ में  मोहान्ध होकर पथ भ्रष्ट  हो  जाया करता  है  ।
    
मुनि जन कहते है कि "न कुत्रापि  कोsपि सुखीति  " दुनियां में कोई भी सुखी  नहीं है  ।इस जड  चेतन के संयोग से बने इस  चमकीले  भड़कीले  जगत में सिवाय दुखों के  कोई रसीला मधुर तत्व  नहीं है  ।यहाँ  हर प्राणी  पदार्थ  नश्वर है   ।  आज है कल नहीं होंगे  । कहा है ......

रे मन क्यों हर्ष करता है तुझे  संसार क्या करना ,होवेगा वास  जंगल में तुझे
घर वार  क्या करना  । जिन्हों घर  झूमते  हाथी  ,  हजारों  लाख थे  साथी   ।
उन्ही को खा गई  माटी  ,    तू खुश  हो  नींद  क्यों  सोया  ।
जिन्हों घर पालकी  घोड़े   जरी और चाँदी के जोड़े  ।
वही अब मौत ने तोड़े  तू  खुश हो नीद क्यों  सोया ।।।

     हे  !  मन  तू योग  साधना कर  ।इस अनित्य  और दुखद देह को सुखप्रद
मत मान  ।यह भ्रम है  धोखा  है  ।सुख  बुद्धि  से  आसक्त  होना उन्हें  पकड़ना
दुःख को पकड़ना है  ।भगवान का  हाथ  पकड़  लेना ही  परम  शान्ति   ...परमानन्द पाना है । उस आनन्दघन  की ही  उपासना  करो   ।

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