Thursday, 22 August 2013

अप्पदीपो भव SELF REALISATION

मैं  अकेला  ही  चला  था   जानिवे---मंजिल   मगर  ।
लोग साथ  आते  गए कारवां  बनता  गया ।।

प्रारम्भ  मैं  केवल आत्मतत्व था  शुद्ध  स्वभाव का।अहंकार  आया, इन्द्रियाँ जुड़ीं, शरीर  जुड़ा, वासनाएं जुड़ीं, फिर संसार  जुड़  गया  ।

ध्यान प्याज  के छिलके जैसा है। छिलके उतारते जाओ यानि मनके विचार हटाते  जाओ शून्य अंत में रह जाएगा। ऐसा कहना है बुद्ध जी का  ।


बुद्ध  शून्यवादी थे वे कहते है कि तुम्हारा स्वभाव शून्यभाव है  ।

ध्यान में परमात्मा भी  याद  न आये वह भी एक पार्ट होगी एक अशद्धि  होगी  . 

सुख उसको ही मिलता है जिसने स्वयम को जाना।स्वयम में रत रहना या लीनं हो जाना महासुख है।अपने में ठहर जाना स्वर्ग है। इसके अतिरिक्त सब दुःख है।

बुद्ध की बड़ी गहन खोज है।समाधि का उपयोग बस इतना ही है कि इससे चित्त मिट जाये। रौशनी केवल इसलिए चाहते है कि अन्धेरा मिट  जाए। ध्यान एक जागा हुआ  चित्त  ।आकांक्षा सोच  विचार कर  करो    कारण कि हम जिस  वस्तु  पर  आकर्षित  होते  हैं  जिसका गुणगान करते   हैं वह एक नेक दिन प्राप्त हो ही जाती है। 

बुद्ध के आखिरीं  वचन:  होश  पूर्वक  जियो  अप्प दीपों भव   ।

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