Tuesday, 20 August 2013

NOW WHAT CAN I DO

ऐ  !  मेरे  हम नशीं  कहीं  और  चल ,
इस  चमन  में  मेरा  अब   गुजारा   नहीं  
जालिमो  ! अपनी  किस्मत पे  नाजां   न हो ,
दौर बदलेगा ये वक्त  की  बात है ,
वो  यकीनन   सुनेगा  सदाएं  मेरी  ।
 क्या  तुम्हारा   खुदा  है हमारा नहीं  ?

महत्वाकांक्षा मनुष्य  को  उद्विग्न  बना  देती  है  कि तुम्हें  आगे  होना है  । आज की    शिक्षा यही  जहर  व्यक्ति के भीतर डालती है  और की  दौर का  नाम  ही  संसार  है ।  धन  हो  तो  थोड़ा ज्यादा  और पद हो तो और ऊंचा । ज्ञान हो तो सबसे  ज्यादा । विषय बदल जाते है और की  मांग  वही।

आखिर  ये  दौड़  कहाँ  खत्म  होगी   ।
               
 यह दौड़  कहीं  खत्म न  होगी  जब  तक  व्यक्ति  कुदरत के  इस नियम को नहीं  मानेगा कि..... प्रारब्ध  से  ज्यादा  और  समय से पहले  कभी कुछ  नहीं  मिलता  । अब  हमको  क्या  पता कि हमारा  कौनसा  कर्म व्यथित  कर  रहा है  ये सारी बातें  अज्ञात हैं । मन को सयंमित  करना पड़ता है ।

समझो  ---हम वर्तुल   पर  खड़े  है और  वर्तुल  का न  कि नारा है नEnd , जैसे क्षितिज  का न  ओर  है न छोर ।जितना  हम  आगे बढ़ते जाते  है लगता है जैसे क्षितिज आगे बढ़  गया ।यह  जीवन भी एक मृग  मारीचिका  है ।

हमको जो  दिखाई दे  रहा है  वह  सत्य नहीं  है   ।

संसार में  जो  छली कपटी लोग  है वे  थोड़े  ही  दिन खुश रह पाते हैं ।

कुदरत शीघ्र ही  उनको  सबक  सिखा  देती  है ।

इसलिए ठहरो जो  है  उसे स्वीकार  करो,  शान्ति  मिलेगी  ।

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