Thursday, 22 August 2013

INTRODUCTION OF SOULआत्म परिचय

ठक ठक.... ठक ठक   ।       
कौन  ....?     मैं   । अरे  दिखाई तो  नहीं  दे रहीं    ।अपना  परिचय  दो  
अपनी  पहिचान  बताओ   ।
हाँ   !    मैं एकं  आत्मा हूँ  ।मैं  निराकार हूँ  मेरा  कोई  आकार  नहीं  ।
मैं जिस शरीर में  जाती  हूँ   उस जैसा ही आकार बना लेती  हूँ  ।  हाथी  हो या
चींटी  मानव  हो  या मच्छर उसी  के  शरीर  जैसा  आकार  बना  लेती हूँ    ।
जैसे  पानी  को  छोटे  या बड़े  बर्तन  में  डालो  उसी का  आकार  ले लेता है  ।
             यह  शरीर  मेरा घर  है  ;निवास  स्थान  है  मेरा  घोंसला  है  ।
मुझे  पक्षी  भी  कहते  हैं  ।पक्षी  मैं  इसलिए  कहलाती   हूँ  क्योंकि  मैं  इस  घोंसले  को  एक   अबाधि पश्चात  छोड़  देती  हूँ । जैसे     शरीर  के   old  
होने पर या  असाध्य  बिमारी  होने  पर अथवा  accident  होने पर   ।
ऐसा  होने  पर  मैं  दूसरा  शरीर  चुन कर  अपना निवास  स्थान  बना  लेती  हूँ  ।
जैसे  आप लोग  पुराने   वस्त्र  छोडकर  नए  वस्त्र  धारण   कर  लेते  हो   ।
कार्य  ...... मेरे  कार्य इस  शरीरमें रहकर   कर्मेंन्दिरियों  को   संचालित 
करना है   अर्थात   हाथ  पैरों  से काम लेना    वाणी  से  बोलना  उपस्थ  और  
गुदा  से   मल मूत्र   विसर्जित  करना    ।
मैं स्वयम  अल्प  शक्ति  हूँ  ।  मुझे शक्ति  परमेश्वर  से मिलती  है  जैसे   सरीर  मेरा घर  है  वैसे  ही  यह  आत्मा प्रभु  का  घर  है   ।मेरी  आत्मा में 
विराज मान  परमेश्वर मेरी   समस्त  ज्ञाने न्दिरियों  को  शक्ति देतेहैं।  मेरे 
आँख  नाक  कान मुख  और  त्वचा  अपना  अपना  कार्य  प्रभु  की  दी  हुई 
शक्ति से करते हैं ।
प्रभु  मेरा मित्र  है  । उसके अलावा मेरा  कोई  मित्र  नहीं  । आत्मा और 
परमात्मा  दोनों  की एक सी पहिचान है  ।हम दोनों निराकार  हैं  अनादि  हैं
अजर (कभी  बुड्ढे नहीं  होते शरीर   बिगड़ता  नहीं  )  अमर    शांत चेतन   हैं 
ज्ञानवां न  हैं  मैं  बोध स्वरूप  द्रष्टा श्रोता   स्प्रष्टा   मन्ता घ्राता  हूँ 
मैं  सबको  जानती  हूँ  मुझे कोई  नहीं  जान  पाता  ।

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