Thursday, 29 August 2013

अनृत पिधाना कामनाएं,DESIRES THAT ARE HIDDEN BY FALSEHOOD

तन को जोगी सब करें ,मन को करें न कोय।  
 बाहर से मुख  मोड़  ले तो मन  जोगी  होय 

बुतों ने न की  आशनाई की  बातें  ,भलों  को ही आती हैं  भलाई की  बातें ।।

लोग ऊपर से ऊंची बात करते  हैं  भीतर  वही  कूडा   कचरा भरा  पड़ा है । अपने अंदर झांकना  होगा , साधना  करनी होगी , जागरूक  होना  सीखना होगा  ।


यह  जिन्दगी उसी की है जो  ध्यान  लगाना  सिख  गया , प्रभु  में  लीनं  हो  गया 


स्वभावत: मानव सुख  चाहता है, दुःख  नहीं । स्वादू  भोजन को कौन  नहीं  खाना चाहता  । पीडादायक  काँटों को  किसने  अपने  दामन में समेटा है । 


दुखों  का  ज्ञान  या तो  बुजुर्ग को होता है अथवा  विवेकी  व्यक्ति  को  । भौतिक पदार्थों   की  चमक दमक से  अभि भूत होकर  संसारी  मानव उन चीजों  के  माया  जाल  को  नहीं  समझ  पाता कि चमक दमक के  नीचे  क्लेश पाश  बिछा हुआ है ।


विषय विकार ही  दुःख के कारण हैं  ।दुःख  सुख  के  साथ  ही चिपटा  हुआ है 

दुःख का  अर्थ  है  इन्द्रियों  को  अप्रिय  लगने वाला  भाव  ।आत्मा  इन्द्रीयों  के विषयों से असंग है वह अक्षर  परमात्मा में सम्प्रतिष्ठित है । विवेक  पूर्ण व्यक्ति  जानता है कि  वासनाएं  जबतक मन में   विद्यमान  हैं  दुःख चक्र नहीं  छुट  सकता । कामनाओं  के  नीचे  वारुदी सुरंगों  के  समान दुखों का जाल  बिछा हुआ है । और हमारी आत्म चेतना  की  ज्ञान  ज्योति  कर्मों  के  जाल् में  बंदी  बन  जाती  है  । जब  मानव का  भोतिक  पदार्थों  का  नशा  उतरता है,  जब दुःख   झेलते  झेलते श्वांस  प्रश्वांस  भी  लेना  मूश्किल   होंने  लगता  है तब वह इन विषय  विकारों  की  व्यर्थता को  समझ पाता है उसे  बोध  हो  जाता है  ।अब वह इन नश्वर  पदार्थो की  नश्वरता  को  समझने  लगता है और  अपने  कुकर्मों  से  छुटकारा  पाने के लिए  सर्वशक्तिमान  परमेश्वर  की   शरण में  जाता है  और सब  क्लेशों सेमुक्त  होकर  परमानन्दमय  का   शाश्वत  आधार  पाकर  अमृत  हो  जाता  है ।

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